केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि सभी चेक बाउंस के मामले अपराध के दायरे में नहीं आते हैं। मगर खाते में पर्याप्त राशि न होने के बावजूद चेक काटने पर बाउंस हुए चेक का मामला अपराध की श्रेणी में रखा गया है ताकि इस सुविधा के दुरुपयोग पर लगाम कसी जा सके। सरकार ने इस कानून का बैंकों और वित्तीय संस्थानों की ओर से दुरुपयोग किए जाने के आरोप को भी गलत ठहराया है।
सर्वोच्च अदालत में दाखिल किए गए हलफनामे में केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने कहा है कि बैंकों की पहली प्राथमिकता अदालत में जाए बिना विवाद को समझौते के आधार पर निपटाने की रहती है। इस कानून के जरिए किसी को परेशान किए जाने का सवाल ही नहीं पैदा होता।
यदि डिफाल्टर अदालत में पहली या दूसरी तारीख पर ही समझौता कर लेता है, तो उस पर किसी तरह का जुर्माना नहीं लगाया जाता। मगर इसके बाद समझौते की अर्जी दायर की जाती है, तो डिफाल्टर को चेक की रकम का दस प्रतिशत जुर्माने के रूप में कानूनी सेवा प्राधिकरण में जमा कराना होगा। इसी प्रकार हाईकोर्ट में जुर्माने का प्रतिशत बढ़कर 15 और सुप्रीम कोर्ट में 20 फीसदी है।
वित्त मंत्रालय ने निगोशिएबल इन्स्ट्रूमेंट एक्ट, 1881 की धारा 138 को असंवैधानिक करार देने की मांग वाली याचिका के जवाब में कहा है कि अर्थव्यवस्था की बेहतरी के लिए संसद ने 1988 में अधिनियम में संशोधन करके चेक बाउंस को अपराध की श्रेणी में लिया। मगर सभी चेक बाउंस अपराध की परिधि में नहीं आते। याची यशवंत शिनॉय ने सरकार की चेक बाउंस संबंधी संशोधन को असंवैधानिक करार देने का अदालत से अनुरोध किया है।
वित्त मंत्रालय के अवर सचिव डीडी माहेश्वरी ने सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे में कहा है कि ऐसा नहीं कि चेक बाउंस होते की रकम अदा न करने वाले शख्स के खिलाफ मुकदमा दायर कर दिया जाता हो। चेक बाउंस होने पर संबंधित पक्ष को नोटिस जारी किया जाता है।
नोटिस जारी होने के 15 दिन के अंदर रकम का भुगतान करने का प्रावधान है। यदि इस अवधि में रकम का भुगतान नहीं किया जाता तो शिकायतकर्ता अदालत में धारा 138 के तहत मुकदमा दायर कर सकता है। इस कानून का मकसद किसी को परेशान करना नहीं है बल्कि बैंकिंग सिस्टम को मजबूत करना और चेक की विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए है।