चंबल के बीहड़ की गोद में बसा गांव, न सड़क, न बिजली, न पेयजल का इंतजाम। प्रधान प्रत्याशियों को छोड़ दें तो आजादी के बाद से आज तक कभी कोई और वोट मांगने नहीं आया।
फिर भी गांव के वोटर आज तक हुए हर चुनाव में अपने मताधिकार का प्रयोग जरूर करते हैं। उधर शहरों तक में चुनाव आयोग से लेकर तमाम संगठन मतदाताओं को जागरूक करने में जुटे हैं कि वोट जरूर डालें।
फिर भी लोकतंत्र के बुनियादी सबक की रोशन पाठशाला बना मऊ की मढ़ैया गांव गुमनामी अंधेरे की में गर्त है। बाह-इटावा मार्ग से दो किलोमीटर दूर दक्षिण में चंबल के बीहड़ के बीच बसा है मऊ की मढ़ैया। यहां तक पहुंचने के लिए पगडंडी ही है।
हर साल देते हैं वोट
पशुपालन पर आश्रित गांववाले विकास किसे कहते हैं, नहीं जानते। यहां न बिजली पहुंची, न पानी। कभी एक हैंडपंप लगा था। वह भी बरसों से खराब है। स्कूल भी नहीं हैं।
एक दशक पहले यहां आबादी 500 के करीब थी। गांव के हालात जिम्मेदार हैं, आधे से अधिक लोग यहां से अन्यत्र जा बसे हैं। गांव में अपराधियों की गोली का डर।
पानी के लिए नदी पर जाओ तो घड़ियाल का खतरा। सारी परिस्थितियां विपरीत, फिर भी जागरूकता इतनी कि यहां के वोटर हर चुनाव में मऊ गांव में बनने वाले मतदान केंद्र तक जाते हैं।
'पगडंडियों के कांटों का डर'
रास्ता बीहड़ की पगडंडी का, साधन पैदल। यहां के लगभग शत-प्रतिशत वोट पड़ते हैं। फिलहाल यहां 90-100 वोटर हैं। गांव की सिया देवी, भगवती, जानकी, रामकली, राजू, मान सिंह, राम किशन की टिप्पणी चुभने वाली है।
वे बोले-पगडंडियों के कांटों का डर कहिए जो आजादी के बाद से आज तक गाड़ियों से चलने वाले नेता गांव नहीं आए।
प्रधानी के चुनाव में तो लोग आ भी जाते हैं लेकिन लोकसभा चुनाव में कभी कोई झांकने न आया।