मध्य जून में कई दिनों की भारी बारिश के कारण केदारनाथ में जो विनाश शुरू हुआ, वह उत्तराखंड की भयावह त्रासदियों में से एक था। कारों को पानी में समाते हुए देखना ऐसा था, मानो खिलौने बह रहे हों! जलप्रलय ने हजारों लोगों की जान ली, अनेक गांव तबाह हो गए और सैकड़ों लोग गायब हो गए।
त्रासदी के बाद पर्यटकों को राज्य से बाहर निकालने में कई दिन लगे, जबकि अनेक गांवों में राहत और पुनर्वास का काम भी संतोषजनक नहीं था। विनाश इतना भीषण था कि राज्य की अर्थव्यवस्था दस साल पीछे चली गई है। इस त्रासदी ने पहाड़ी इलाकों में विकास के नाम पर पर्यावरण के साथ खिलवाड़ पर भी सवाल उठाया है।
नवाज की जीतः मिलेगा विश्वास या विश्वासघात!
तीसरी बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री चुने जाने के साथ ही पाकिस्तान मुस्लिम लीग-एन के मुखिया नवाज शरीफ ने यह साबित कर दिया है कि उन्हें पंजाब का शेर यों ही नहीं कहा जाता। वैसे पाकिस्तान का आम चुनाव इस मायने में भी ऐतिहासिक रहा कि यह पहली दफा था, जब देश में कोई निर्वाचित सरकार लोकतांत्रिक ढंग से प्रतिस्थापित की गई।
देश के सबसे अमीर लोगों में शुमार किए जाने वाले नवाज पर बेशक भ्रष्टाचार के तमाम आरोप लगते रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद चुनाव से ऐन पहले उन्होंने एक ऐसी सरकार का वायदा किया था, जिसमें भ्रष्टाचार न हो। देखना है कि वह इस कसौटी पर कितना खरे उतरते हैं।
अफजल गुरु को फांसीः राजनीति या सही फैसला!
दिसंबर, 2001 में संसद पर हुए आतंकी हमले के मास्टरमाइंड अफजल गुरु को फांसी देकर हमारी सरकार ने यह संदेश दिया कि वह आतंकवाद पर राजनीति नहीं करती, बल्कि उससे कठोर तरीके से निपटने में विश्वास रखती है। यह अलग बात है कि गोपनीय तरीके से उसे फांसी देने की मानवाधिकारवादियों ने आलोचना की।
इस बारे में उसके परिवारजनों को भी समय पर सूचना नहीं मिली थी। कभी मेडिकल और आईएएस की तैयारी कर चुके अफजल गुरु की छवि बेशक एक आम आतंकवादी जैसी नहीं थी, लेकिन लोकतंत्र के प्रतीक को ध्वस्त करने का ताना-बाना रचने का उसका जुर्म सामान्य भी नहीं था।
मंगल की ओर कदमः भारत की लंबी छलांग
चंद्रयान मिशन की कामयाबी के बाद भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम ने नई ऊंचाइयां छूने के लिए अपनी कमर कस ली है। इसी कड़ी में भारत के बहुप्रतीक्षित मंगलयान को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया गया। इस अभियान का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है कि 1960 से अब तक पूरी दुनिया में ऐसे तकरीबन 45 अभियान हो चुके हैं, जिनमें एक-तिहाई नाकामयाब रहे हैं।
इसके अलावा पिछले पचास वर्षों में संपन्न सारे मंगल अभियानों में यह सबसे कम खर्चीला भी बताया जा रहा है। अगर सब कुछ उम्मीदों के मुताबिक रहा, तो भारत कामयाबी के साथ मंगल मिशन शुरू करने वाले चुनींदा देशों में शामिल हो जाएगा।
आरुषि मामले में फैसलाः मिला न्याय या खोया न्याय!
मई, 2008 में आरुषि तलवार और घरेलू नौकर हेमराज की हत्या का ऐसा मामला सामने आया था, जिसकी गुत्थी सुलझने में पांच साल लग गए। जलवायु विहार के एक फ्लैट में रहने वाले चार लोगों में से दो की हत्या हो गई थी, और शेष दो खुद को निर्दोष बता रहे थे, जबकि परिस्थितिजन्य सुबूत उन्हीं पर उंगली उठा रहे थे।
एक होनहार लड़की की रहस्यमयी मौत जितनी सनसनीखेज थी, उनके माता-पिता को एक से दूसरी अदालतों में जमानत के लिए जाते देखना उतना ही आश्चर्यजनक था। आखिरकार सीबीआई की विशेष अदालत ने दोहरी हत्या के जुर्म में आरुषि के माता-पिता नूपुर और राजेश तलवार को उम्रकैद की सजा सुनाई।
लोकपाल की नींवः आखिरकार मिला कानून
लोकपाल विधेयक का संसद से पारित होना एक घटना है, क्योंकि भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल की जरूरत महसूस करने के बावजूद पिछले करीब पांच दशकों से यह विधेयक अटका पड़ा था। 2011 में लोकसभा से पारित होने के बाद राज्यसभा में इसकी राह में रोड़े अटका दिए गए थे। हालांकि लोकपाल भ्रष्टाचार को निर्मूल करने की गारंटी नहीं है।
अन्ना के मुताबिक, इससे भ्रष्टाचार 40-50 फीसदी तक ही कम होगा, जबकि आम आदमी पार्टी इसे जोकपाल बता रही है, इसके बाद भी लोकपाल के महत्व से इन्कार नहीं किया जा सकता। भ्रष्टाचार के खिलाफ जनांदोलन ने लोकपाल को पारित कराने में बड़ी भूमिका अदा की।
चीन को चुनौतीः लद्दाख तक हवाई पहुंच
अग्रिम हवाई पट्टी होने के कारण लद्दाख का दौलत बेग ओल्डी क्षेत्र हमारे लिए सामरिक महत्व का है, और इसलिए चीन की नजर भी इस पर रही है। पर इस वर्ष भारत ने दौलत बेग ओल्डी में एक सुपर हरक्यूलिस विमान उतारकर न सिर्फ अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन किया, बल्कि चीन की तरफ से हो रही घुसपैठ का भी मुंहतोड़ जवाब दिया।
बीजिंग को यह संदेश देने में भी नई दिल्ली सफल रही कि स्थिति अब 1962 वाली नहीं है, और उसकी तरफ नजर उठाने की वह भूल न करे। शायद इसलिए उस घटना के बाद घुसपैठ की कोई बड़ी खबर नहीं आई है! इससे पहले यहां भारतीय वायुसेना ने 1962 और 1965 में विमान उतारा था।
समलैंगिकों का हकः फैसले की हुई आलोचना
वर्ष 2009 की दो जुलाई इतिहास के पन्नों में इसलिए दर्ज हुई, क्योंकि उस दिन दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को अवैध बताते हुए उसे समलैंगिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन माना था, लेकिन इस वर्ष सर्वोच्च अदालत ने दिल्ली उच्च न्यायालय के उस फैसले को ही ′कानूनी रूप से गलत′ बता दिया।
यानी अब समलैंगिकों के बीच सहमति से बनने वाले संबंध अपराध माने जाएंगे। हालांकि केंद्र सरकार ने इस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल कर दी है, लेकिन मानवाधिकारवादियों की मानें, तो धारा 377 बहाल कर ′सर्वोच्च अदालत एक सांविधानिक वायदे से मुकर गया है।′
माओवादी हमलाः लोकतंत्र पर चोट की कोशिश
छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा अन्य चुनावी अभियानों की तरह ही थी, लेकिन जब यह यात्रा दरभा से गुजरी, तो ′खूनी यात्रा′ में बदल गई।
दंडकारण्य का यह हिस्सा माओवादियों द्वारा की गई अब तक की सबसे बड़ी राजनीतिक हत्या का गवाह बना, जिसमें कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नंद कुमार पटेल और सलवा जुड़ूम के संस्थापक महेंद्र कर्मा सहित कई कांग्रेसी नेताओं को मौत के घाट उतार दिया गया। नक्सली समस्या का हल किस तरह हो, इस पर बहस चल रही है, लेकिन इस घटना ने रमन सिंह सरकार की नींद जरूर उड़ा दी, जो नक्सलियों के खिलाफ मानवरहित विमानों से अभियान छेड़ने का ऐलान कर चुके थे।
परमाणु समझौताः ईरान और अमेरिका आए पास
दो देशों के बीच दशकों पुरानी शत्रुता अगर किसी शांति समझौते पर खत्म हो, तो वह अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां बटोरेगी ही। अमेरिका और ईरान के बीच हुआ परमाणु समझौता कुछ ऐसा ही है। ईरान के साथ अमेरिका की तनातनी पिछले एक दशक पहले तब ज्यादा बढ़ गई, जब ईरान ने परमाणु कार्यक्रमों की ओर मजबूत कदम बढ़ाए।
बेशक इस समझौते से ईरान को करीब पांच अरब डॉलर का आर्थिक लाभ होगा, पर वैश्विक शांति कायम रखने के लिए यह ′कीमत′ कम ही मानी जा रही है। वैसे इस समझौते का श्रेय काफी हद तक ईरान के नए राष्ट्रपति मौलवी हसन रोहानी को जाता है, जो आमतौर पर नरमपंथी नेता के रूप में जाने जाते हैं।
तेलंगाना की राहः राह में फूल कम कांटे ज्यादा
यह साल तेलंगाना की सियासत के तमाम उतार-चढ़ावों का गवाह बना। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अलग तेलंगाना राज्य पर अपनी मुहर लगाई, जिससे तेलंगाना के लोगों को अपनी दशकों पुरानी मांग पूरी होती दिखी, वहीं तटीय आंध्र और रायलसीमा (सीमांध्र) के लोगों ने अपना रोष दिखाया।
सीमांध्र से जुड़े कई मंत्रियों और सांसदों ने तो इस्तीफे तक की पेशकश कर डाली, हालांकि बाद में उन्हें मना लिया गया। रोचक यह भी रहा कि तेलंगाना के गठन के कांग्रेस के फैसले का विरोध खुद मुख्यमंत्री एन. किरण कुमार रेड्डी ने किया। देश के 29वें राज्य तेलंगाना में अविभाजित आंध्र प्रदेश के 23 में से 10 जिले शामिल होंगे।
अमेरिकी शटडाउनः आर्थिक नहीं राजनीतिक बंदी
किसी ने नहीं सोचा होगा कि महज राजनीतिक वजहों से विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र काम करना बंद कर सकता है। 16 दिनों का यह शटडाउन अमेरिकी इतिहास में सरकारी कामबंदी की तीसरी सबसे बड़ी घटना थी। इससे पहले 1978 में 18 दिन और 1995-96 में 21 दिनों तक सरकारी काम ठप रहा था।
सरकारी खर्च विधेयक पर रिपब्लिकन और डेमोक्रेट में सहमति न बन पाना ही वर्तमान संकट का प्रमुख कारण रहा। हालांकि ऋण सीमा बढ़ाने के विधेयक पर अमेरिकी संसद की मुहर लगने के बाद फिलहाल यह संकट टल गया है, लेकिन अमेरिका में राजकोषीय नीति को लेकर अनिश्चितता को कम करने की जरूरत अब भी कायम है।