अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कामयाबी के बाद फिल्म ‘मिस लवली’ को भारतीय समीक्षकों की सराहना भी मिली लेकिन जिस ऐक्टर ने सबका ध्यान आकर्षित किया वह हैं, चंडीगढ़ के रहने वाले अनिल जॉर्ज।
वह लंबे समय से मुंबई में हैं। थियेटर उनका पैशन है और इससे पहले भी उन्होंने फिल्मों में काम किया है। परंतु इस ख्याति के बाद लोग उनसे कुछ अलग ढंग से मिल रहे हैं।
‘मिस लवली’ से आपको ऐक्टर के रूप में चारों ओर ख्याति मिली है। अब क्या जिंदगी कुछ बदली-सी नजर आती है?
बिल्कुल। मैं इसे महसूस कर रहा हूं। अब मैं बाहर जाता हूं तो लोग पहचानते हैं। वे मुझे फोन करते हैं। बड़ा बदलाव यह है कि इस फिल्म के बाद कई बड़े बैनरों से मेरे पास कॉल आ रहे हैं।
मैं काफी समय से अभिनय की दुनिया में हूं और अब जिस तरह से लोग मेरे काम को सराह रहे हैं, उसे देख कर खुशी हो रही है।
आपने कई फिल्मों में बड़े डायरेक्टरों के साथ भी काम किया। लेकिन दर्शकों की नजर में नहीं आ सके। ऐसा क्यों...?
इसके दो कारण हैं। एक तो मैंने खुद आगे रह कर लोगों को बताया नहीं और दूसरे अक्सर ऐसा हुआ कि अच्छा रोल की एडिटिंग टेबल पर काट-छांट हो गई।
अब यह बात में कब-कब, किसे-किसी बताता! लेकिन अच्छा यह था कि मैंने हिम्मत नहीं हारी क्योंकि मूल रूप से मैं थियेटर आर्टिस्ट हूं।
मुंबई में सिर्फ थियेटर करके जिंदा रहना कितना कठिन है क्योंकि उत्तर भारत से कई युवा अभिनेता यहां आना चाहते हैं। वे सोचते हैं कि फिल्म नहीं तो थियेटर कर लेंगे!
बहुत मुश्किल है। थियेटर में पैसा तो नहीं के बराबर है... सिर्फ स्ट्रगल है। जबकि दिल्ली के थियेटर की स्थिति यहां से बहुत अच्छी है। ऐसा मुझे लगता है। दिल्ली के कई थियटरों के विदेश जाने के मौके मिलते हैं। मुंबई में ऐसे मौके कम हैं।
‘मिस लवली’ में आप कैसे आए?
थियेटर की दुनिया में मिर्जा गालिब पर मेरा नाटक काफी प्रसिद्ध है। उसका ही शो हो रहा था। मेरे डायरेक्टर हैं सईद आलम। उन्होंने कहा कि एक फिल्म है जिसका ऑडिशन हो रहा है।
मैं कभी ऑडिशन पर नहीं जाता। लेकिन उन्होंने जोर दिया। फिर ‘मिस लवली’ के डायरेक्टर अशिम अहलूवालिया से जब मैं मिला तो उन्हें पसंद आ गया। शुरुआत में मुझे लगा कि यार यह सब क्या है?
फिल्म में मैं गालियां दे रहा हूं और पता नहीं क्या क्या हो रहा है... यहां सी ग्रेड की फिल्म बनाने का काम कर रहा हूं। लेकिन सच बताऊं, जब फिल्म पूरी बन गई और देखी तो मजा आया। वास्तव में हमने ए ग्रेड की फिल्म बनाई है। जिसमें सी ग्रेड की फिल्म बनाई जा रही है।
क्या फिल्म इंडस्ट्री में आपको कभी सी ग्रेड की फिल्म में काम करने का ऑफर मिला?
प्रत्यक्ष रूप से तो ऐसा नहीं हुआ लेकिन मेरे पास कई ऐसी फिल्में आईं जो सी ग्रेड की थीं। परंतु मेरी छठी इंद्री हमेशा मुझे बता देती थी कि ये लोग क्या बनने जा रहा है।
इसलिए मैं बचा रह गया। एक बार जरूर ऐसा हुआ कि एक आदमी ने मुझसे पैसा लिया और सी ग्रेड की फिल्म में लगा दिया।
नवाजुद्दीन सिद्दीकी के कैरियर की भी यह शुरुआती फिल्म है। तब वे आज की तरह जाने-पहचाने नहीं थे। क्या कहेंगे उनके बारे में?
नवाज को मैं फिल्म में आने से पहले से जानता था। हमने थियेटर में भी कुछ काम साथ किया था। वह बेहतरीन ऐक्टर हैं। फिल्म में वह मेरे छोटे भाई बने हैं। हमारे संबंध आज भी पहले की तरह हैं। मुझे उनकी कामयाबी देख कर अच्छा लगता है।