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'मैने कुंजियां पढ़कर परीक्षाएं पास की हैं'

Thu, 30 Jan 2014 01:09 PM IST
रवि बुले/अमर उजाला मुंबई
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‘बैंड बाजा बारात’ से ‘गोलियों की रासलीलाः राम-लीला’ तक दर्शकों ने रणवीर सिंह को पसंद किया है। अब ‘गुंडे’ रिलीज को तैयार है। जब मीडिया रणवीर को ‘न्यू किंग ऑफ रोमांस’ कहता है तो उन्हें बहुत अच्छा लगता है।
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वे रोमांस पर बात करने से बचते हैं। वे एक जगह बैठ कर बात नहीं करते बल्कि बेचैन आत्मा की तरह कमरे में टहलते रहते हैं। इस बेचैनी का सबब क्या है, जानिए सीधे रणबीर से...

आप इतने बेचैन क्यों हैं? क्या बात है?

हमेशा से मेरा नेचर ही ऐसा है। मुझे कभी चैन ही नहीं होता। ऐसा क्यों हैं, इस बारे में मैंने अब सोचना बंद कर दिया है क्योंकि बहुत सोचने के बाद भी मुझे जवाब नहीं मिला।
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इस बेचैनी में आखिर क्या सोचते रहते हैं?

क्या बताऊं... बस मैं सोचता रहता हूं... बहुत सारी बाते हैं। दुनिया के बारे में, जिंदगी के बारे में, लोगों के बारे में, कैरियर के बारे में, फिल्मों के बारे में, कहानी के बारे में, किरदारों के बारे में... ढेर सारी बातें दिमाग में हमेशा चलती रहती हैं। बंद ही नहीं होतीं।

क्या इसका संबंध पढ़ने लिखने से है? खूब किताबें पढ़ते हैं?

बिल्कुल नहीं, मैं किताबें जरा भी नहीं पढ़ता। मुझसे मुश्किल से ही अपनी स्क्रिप्ट पढ़ी जाती हैं, बैठ कर किताबें कैसे पढ़ूंगा। पता नहीं क्यों... मैं पढ़ नहीं सकता। सिर्फ अच्छी स्क्रिप्ट पढ़ने में मुझे मजा आता है। मैं बहुत धीरे पढ़ता हूं क्योंकि रीडर नहीं हूं। हां, आप कुछ भी दिखा दीजिए... फिल्म सीरियल... मैं खूब देख सकता हूं।

वैसे मुझे अपने आप पर पूरा कॉन्फिडेंस है कि जिस दिन मुझमें एक लेवल की मैच्योरिटी आ जाएगी... ठहराव आ जाएगा... तब मैं किताबें ही पढ़ता रहूंगा। मुझे अंदर ही अंदर खबर है कि जिस दिन दो चीजों का मुझे कीड़ा मुझे काट लेगा तो मैं उनसे कभी उबर नहीं पाऊंगा... एक रीडिंग और दूसरा गोल्फ। फिर मैं इनमें खो ही जाऊंगा।

पढ़ने से इतना दूर भागते हैं तो स्कूल के दिनों में क्या करते थे?

मैं एक्जाम की आखिरी रात तक इंतजार करता था पढ़ने से बचने का। फिर आखिरी मौके पर गाइड वगैरह पढ़के चला जाता था। शॉर्ट टर्म मैमोरी में जो रह जाता था, वह लिख डालता था। वैसे जिन विषयों में मेरा दिल लगता था, उनमें काफी अच्छे नंबर आते थे। हिंदी, इंग्लिश और हिस्ट्री मुझे अच्छे लगते थे। लेकिन मैं मैथ्य, साइंस और अकाउंट्स में फेल हो जाता था।

इतिहास आपका प्रिय विषय था तो क्या कोई ऐतिहासिक किरदार आपके जहन में है, जिसके रूप में आप पर्दे पर उतरना चाहेंगे?

इस तरह से तो मैंने सोचा नहीं, लेकिन अब सोचूंगा। मुझे कोई भी बायोपिक बहुत इंट्रेस्टिंग लगती है। जिस व्यक्ति को दुनिया ने देखा है जाना है, उसके रंग-ढंग में खुद को ढाल लेना वाकई चुनौती है। मैं इस चुनौती के लिए तैयार हूं।

फिल्म ‘गुंडे’ में आपकी एंट्री कैसे हुई?

एक दिन डायरेक्टर अली अब्बास जफर का फोन आया कि यार ऐसी-ऐसी फिल्म है, करेगा क्या? मैंने कहा कि कर तो लूं लेकिन जो डेट्स आप मांग रहे हैं वो यशराज के पास हैं। आपकी फिल्म भी यशराज की है, अगर आप अंदर-अंदर बातें करके डेट्स का मसला सुलझा लें जरूर बात कर सकते हैं।

एक छुट्टी के दिन आदि (आदित्य चोपड़ा) का फोन आया कि ऑफिस आ जाओ तो मैंने सोचा कि ये क्या हो रहा है! यहां आया तो आदि, अर्जुन (कपूर) और अली बैठे थे।

आदि ने कहा कि अली के पास दो हीरो की फिल्म है मैं चाहता हूं कि आप और अर्जुन साथ में सुनें। सुन कर तो मैं इंप्रेस हो गया। मैंने कहा कि हां मैं बाला का रोल करूंगा तो अली ने कहा कि बाला नहीं बिक्रम। मैंने फिर कहा कि यह रोल मुझे सूट करेगा। तब अली ने कहा कि यही मजा है कि जो रोल सूट नहीं करेगा और जो दोनों की पर्सनैलिटी के विपरीत है, वही तुम लोगों को करना है। आदि और अली ने हमें कन्विंस किया।

माना जाए कि ‘गुंडे’ मास एंटरटेनर है!

बिल्कुल। दर्शकों को इसमें बहुत मजा आएगा। वैसे कहना चाहूंगा कि ‘मास एंटरटेनर’ शब्द कई बार ऐसे इस्तेमाल किया जाता है जैसे कोई गाली है। मुझे लगता है कि रोहित शेट्टी, करन मल्होत्रा और अली अब्बास जफर ऐसे डायरेक्टर हैं जो आम आदमी की नब्ज को जानते हैं।

लेकिन कुछ लोगों ने बिना कहानियों वाली बे-सिर-पैर की मास एंटरटेनर फिल्में बनाई हैं, उन्होंने इस विधा को बदनाम किया है। हमारी फिल्म में स्टोरी है, कैरेक्टर है, अच्छे गाने हैं, बढ़िया फाइटिंग हैं।
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