संजीव कुमार के साथ कुछ वैसे ही इत्तफाक बनते रहे जैसे क्रिकेट में राहुल द्रविड़ के साथ रहा। संजीव कुमार फिल्मी दुनिया के श्रेष्ठ हरफनमौला किरदारों में से एक थे। पर उनके साथ समस्या यह रही कि हर दौर में कोई न कोई बड़ा सितारा उनके हिस्से की पब्लिसिटी लूटता रहा।
जिन मल्टीस्टारर हिट फिल्मों का वह हिस्सा बनते उनके हिट होने की वजह इंडस्ट्री दूसरे कलाकारों को देती रहती। 1960 के दशक में जब संजीव कुमार ने बॉलीवुड में इंट्री की तो उस समय देवानंद, राजकूपर, राजेंद्र कुमार जैसी कलाकारों के साथ दिलीप कुमार का भी आगमन हो चुका था। यह कलाकार ही उस दौर में छाए रहे।
इसके आगे की डगर में संजीव कुमार के साथ धर्मेंद्र, राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन जैसे कलाकार इंडस्ट्री का चार्म लूटते रहे। बावजूद इसके संजीदा अभिनय करने वाले संजीव कुमार ने न सिर्फ खुद को स्थापित किया बल्कि फिल्मकारों को यह संदेश भी दिया कि कुछ भूमिकाएं सिर्फ वहीं कर सकते हैं। संजीव कुमार, गुलजार के प्रिय कलाकार रहे हैं। संजीव और गुलजार ने मिलकर एक साथ कई फिल्में कीं। 1993 में रिलीज हुई उनकी फिल्म 'प्रोफेसर की पडो़सन' संजीव कुमार की अंतिम फिल्म रही।
थिएटर के बाद फिल्मों का रुख
संजीव कुमार का जन्म मुंबई में 9 जुलाई 1938 को एक मध्यम वर्गीय गुजराती परिवार में हुआ था। अपने जीवन के शुरूआती दौर मे रंगमंच से जुड़े और बाद में उन्होंने फिल्मालय के एक्टिंग स्कूल में दाखिला लिया। इसी दौरान वर्ष 1960 में उन्हें फिल्मालय बैनर की फिल्म 'हम हिन्दुस्तानी' में एक छोटी सी भूमिका निभाने का मौका मिला।
वर्ष 1962 में राजश्री प्रोडक्शन की निर्मित फिल्म 'आरती' के लिए उन्होंने स्क्रीन टेस्ट दिया जिसमें वह पास नही हो सके। सर्वप्रथम मुख्य अभिनेता के रूप में संजीव कुमार को 1965 में प्रदर्शित फिल्म 'निशान' में काम करने का मौका मिला। 1960 से 1968 तक संजीव कुमार फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करते रहे।
फिल्म 'हम हिंदुस्तानी' के बाद उन्हें जो भी भूमिका मिली वह उसे स्वीकार करते चले गए। इस बीच उन्होंने 'स्मगलर', 'पति-पत्नी', 'हुस्न और इश्क', 'बादल', और 'गुनहगार' जैसी कई फिल्मों में अभिनय किया लेकिन इनमें से कोई भी फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हुई। वर्ष 1968 में प्रदर्शित फिल्म शिकार में वह पुलिस ऑफिसर की भूमिका में दिखाई दिए।
यह फिल्म पूरी तरह अभिनेता धर्मेन्द्र पर केन्द्रित थी फिर भी सजीव कुमार धर्मेन्द्र जैसे अभिनेता की उपस्थिति में अपने अभिनय की छाप छोड़ने में कामयाब रहे। इस फिल्म में उनके दमदार अभिनय के लिए उन्हें सहायक अभिनेता का फिल्म फेयर अवार्ड भी मिला।
आते रहे दर्शकों की निगाहों में
वर्ष 1968 में प्रदर्शित फिल्म संघर्ष में उनके सामने हिन्दी फिल्म जगत के अभिनय सम्राट दिलीप कुमार थे लेकिन संजीव कुमार अपनी छोटी सी भूमिका के जरिए दर्शकों की वाहवाही लूट ली। इसके बाद आशीर्वाद, राजा और रंक, सत्याकाम और अनोखी रात जैसी फिल्मों में मिली कामयाबी के जरिए संजीव कुमार दर्शकों के साथ फिल्मी जगत में भी अपनी स्थिति को मजबूत करते रहे।
वर्ष 1970 में प्रदर्शित फिल्म खिलौना की जबर्दस्त कामयाबी के बाद संजीव कुमार बतौर अभिनेता अपनी अलग पहचान बना ली। वर्ष 1970 में ही प्रदर्शित फिल्म दस्तक में उनके लाजवाब अभिनय के लिए वह सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वर्ष 1972 में प्रदर्शित फिल्म कोशिश में उनके अभिनय का नया आयाम दर्शकों को देखने को मिला।
फिल्म 'कोशिश' में गूंगे की भूमिका निभाना किसी भी अभिनेता के लिए बहुत बड़ी चुनौती थी। इस फिल्म में उनके लाजवाब अभिनय के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया। खिलौना, दस्तक और कोशिश जैसी फिल्मों की कामयाबी से संजीव कुमार शोहरत की बुंलदियों पर जा बैठे।
शुरू किए नए प्रयोगः
वर्ष 1974 में प्रदर्शित फिल्म नया दिन नयी रात में संजीव कुमार के अभिनय और विविधता के नए आयाम दर्शकों को देखने को मिले इस फिल्म में उन्होंने नौ अलग-अलग भूमिकाओं में अपने अभिनय की छाप छोड़ी। यूं तो यह फिल्म उनके हर किरदार की अलग खासियत की वजह से जानी जाती है लेकिन इस फिल्म में उनके एक हिजड़े का किरदार आज भी फिल्मी दर्शकों के मस्तिष्क पर छा जाता है।
फिल्म कोशिश और परिचय की सफलता के बाद गुलजार संजीव कुमार के पसंदीदा निर्देशक बन गए। बाद में संजीव कुमार ने गुलजार के निर्देशन में 'आंधी', 'मौसम', 'नमकीन' और 'अंगूर' जैसी कई फिल्मों में अपने अभिनय का जौहर दिखाया। वर्ष 1982 में प्रदर्शित फिल्म 'अंगूर' में संजीव कुमार की दोहरी भूमिका शायद हीं कोई भूल पाए।
अभिनय की एकरूपता से बचे
अभिनय मे एकरूपता से बचने और स्वंय को चरित्र अभिनेता के रूप में भी स्थापित करने के लिए संजीव कुमार ने अपने को विभिन्न भूमिकाओं में पेश किया। इस क्रम में वर्ष 1975 में प्रदर्शित रमेश सिप्पी की सुपरहिट फिल्म 'शोले' में वह फिल्म अभिनेत्री जया भादुड़ी के ससुर की भूमिका निभाने से भी नही हिचके। शोले के ठाकुर की भूमिका आज भी दर्शकों के जेहन में जिंदा है। 1977 में प्रदर्शित फिल्म 'शतरंज के खिलाड़ी' में उन्हें महान निर्देशक सत्यजीत रे के साथ काम करने का मौका मिला। इस फिल्म के जरिए भी उन्होंने दर्शकों का मन मोहे रखा।
इसके बाद संजीव कुमार ने 'मुक्ति' (1977),'त्रिशूल' (1978) 'पति पत्नी और वो' (1978) 'देवता' (1978),'जानी दुश्मन' (1979), 'गृहप्रवेश' (1979), 'हम पांच' (1980), 'चेहरे पे चेहरा' (1981), 'दासी'(1981), 'विधाता' (1982), 'नमकीन' (1982), 'अंगूर' (1982) और 'हीरो' (1983) जैसी कई सुपरहिट फिल्मों के जरिए दर्शकों के दिल पर राज किया। उनकी आखिरी कुछ फिल्में 'कांच की दीवार', 'राही' और 'कत्ल' रहीं। यह फिल्में बहुत सफल नहीं रहीं। संजीव कुमार के अंतिम फिल्म 'प्रोफेसर की पडो़सन' 1993 में उनकी मृत्यु के बाद रिलीज हुई।
व्यक्तिगत जीवन और मृत्युः
संजीव कुमार ने विवाह नहीं किया। कई नायिकाओं के साथ उनके किस्से जरूर सुनने को मिले पर अंततः उन्होंने शादी नहीं की। सुलक्षणा पंडित के साथ उनकी शादी की बात लगभग पक्की हो गई थी, पर शादी नहीं हो सकी। हेमा मालिनी के साथ भी संजीव कुमार का नाम जुड़ा। संजीव कुमार का जीवन बहुत लंबा नहीं रहा। 1985 में जब वह 47 साल के थे तब दिल का दौरा पड़ने पर उनकी मृत्यु हो गई।