स्पाइनल कॉर्ड सोसाइटी के अध्यक्ष डॉ. एचएस छाबड़ा ने कहा कि देशभर में ऐसे मामलों का केवल अनुमान ही लगाया जाता है। यदि दुर्घटना के समय स्पाइन कोड सेल को बचा लिया जाए तो मरीज जल्दी रिकवर कर सकता है, लेकिन देखा गया है कि लोग जानकारी के अभाव में सेल को डेड कर देते हैं, जो समस्या को बढ़ा देता है। विदेशों में इसे लेकर नीति है, यही कारण है कि वहां ऐसे मामलों में तुरंत उपचार मिल जाता है। एक अनुमान है कि हर साल 25 हजार मामले आते हैं, जबकि यह आंकड़ा काफी बड़ा हो सकता है।
ऐसे हो सकता है बचाव
सम्मेलन में दुनियाभर आए 600 से अधिक स्वास्थ्यकर्मियों ने कहा कि दुर्घटना के स्थल पर यदि पीड़ित के पीठ को मोड़े बिना उठाया जाता है, तो रीढ़ की हड्डी में होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है। कई बार दुर्घटना में रीढ़ की हड्डी में नुकसान कम होता है, लेकिन उसे उठाकर लाने में नुकसान हो जाता है। यदि उसे सही से अस्पताल तक पहुंचाया जाता है, तो मरीज की समस्या कम हो सकती है। रीढ़ में चोट के कारण मौत तक भी हो जाती है।