पंजाब की मिट्टी में कुछ खास है जो मुझे हमेशा अपनी और खिंचती है। यहां की मिट्टी में भी संगीत बसता है। पंजाब में कई सूफी गायक हुए और उन्हीं ने मुझे प्रेरित किया कि मैं भी सूफी गीत गाऊं।
यह कहना है राजस्थान के लोक गायक बाबू खान का। बाबू खान मंगलवार शाम प्रेस क्लब के फाउंडेशन डे के अवसर पर प्रस्तुति देने पहुंचे थे। इससे पहले उन्होंने अपने संगीत के सफर की कुछ यादें साझा कीं।
बाबू ने कहा कि निंबूड़ा-निंबूड़ा गाने में कंपोजिशन उनकी थी, लेकिन फिल्म हम दिल दे चुके सनम में वह उनसे बिना पूछे ली गई। इसके खिलाफ केस भी किया, लेकिन लोकगीत कहते हुए इसका कोई फैसला नहीं निकला।
पाकिस्तान में करनी पड़ी बिना वाद्य यंत्र गायकी
कुछ साल पहले बाबू खान पाकिस्तान के कराची शहर में एक कार्यक्रम में शामिल हुए। वहां जैसे ही वह गीत गाने के लिए टीम के साथ बैठे तो उन्हें वाद्य यंत्रों के साथ गाने से रोक दिया गया। उन्हेें कहा गया कि यहां वाद्य यंत्र बजाने की इजाजत नहीं है, जिस वजह से उन्हें बिना वाद्य यंत्रों के ही गायकी पेश करनी पड़ी। ऐसा ही उनके साथ इराक में भी हुआ।
विदेशों में ज्यादातर पंजाबी है सुनने वाले
बाबू वैसे तो राजस्थानी लोक गायक हैं, लेकिन विदेशों में उन्हें ज्यादातर पंजाबी श्रोता सुनना पसंद करते हैं। उन्होंने बताया कि विदेशों में पंजाबियों की एक बड़ी आबादी है, जिस वजह से उन्हें ज्यादातर पंजाबी ही सुनने आते हैं और इसलिए उनका लगाव पंजाब से ज्यादा है।
एआर रहमान है नायाब
बाबू ने ऑस्कर विजेता एआर रहमान के साथ ‘ख्वाजा मेरे ख्वाजा’ गीत (फिल्म जोधा अकबर) और खेल रहा हूं मैं तलवार से (फिल्म नायक) में काम किया। काम के दौरान वह एआर रहमान के घर पर भी ठहरे। उन्होंने बताया कि रहमान खुदा से जुड़े हुए कलाकार हैं, वह घर में और बाहर बेहद ही साधारण तरीके से रहते हैं और उनके अंदर संगीत की एक विशेष काबलियत है। बाबू ने बताया कि शंकर एहसान लॉय के साथ ‘लक बाय चांस’ में काम करके शंकर की संगीत में विविधता का भी पता चला।
लाइव सिंगिग का अपना मजा
बाबू ने कहा कि उन्हें फिल्मों से ज्यादा मजा स्टेज शो में आता है, जहां वह श्रोताओं से सीधे जुड़ते हैं। श्रोताओं की फरमाइश पर भी गीत गाते हैं, जिसमें निंबूड़ा गाना अकसर होता है। बाबू ने राजस्थानी लोक गायकी के बारे में बताया कि वैसे तो क्लासिकल गायकी बहुत मुश्किल है, इसलिए आजकल युवा इस ओर नहीं आ रहा। सरकार ने भी इस दिशा में कोई खास कदम नहीं उठाए हैं।
बचपन से सिखाया जाता है संगीत
बाबू के साथ उनका 21 वर्षीय बेटा कैलाश भी स्टेज पर संगत करता है। बाबू ने कहा कि हमारे यहां बच्चों को संगीत सिखाने की विधा बचपन से है। इसलिए अपने बेटे को भी संगीत सिखाया, लेकिन यह इतना आसान नहीं, क्योंकि इसके लिए साधना की बहुत जरूरत होती है। कठिन रियाज की वजह से उनका बेटा पढ़ाई को समय नहीं दे पाया और केवल छुट्टी के दिन ही पढ़ाई करता था।