बीएड की सीटें खाली रहने के बाद प्राइवेट कॉलेजों को एक और झटका लगा है। अब एमएड की तकरीबन 90 फीसदी सीटें खाली रह गई हैं। इससे संचालकों को कोर्स को जारी रखना मुश्किल हो गया है। एचपीयू ने बीएड और एमएड कोर्स दो साल का कर दिया है। निजी कॉलेजों को दाखिले के लिए छात्र ढूंढे नहीं मिल रहे हैं। हालांकि, सरकारी कॉलेजों में स्थिति ठीक है।
प्राइवेट कॉलेजों में तो कहीं एक से दो दाखिले हुए हैं। मगर निजी बीएड कॉलेजों में प्रवेश लेने वाले छात्रों की संख्या में भारी गिरावट आई है। एचपीयू एजूकेशन विभाग और संबद्ध 12 निजी बीएड कॉलेजों में 89 फीसदी एमएड की सीटें खाली रह गई हैं। मुश्किल से दस-दस फीसदी सीटें ही भर पाईं है। इन 13 संस्थानों के आवंटित प्रति संस्थान 50-50 सीटों यानि 650 सीटों में से 582 सीटें खाली रह गई हैं। इनमें 68 सीटें ही भरी हैं।
इससे निजी कॉलेजों को तो एमएड का बैच बिठाना और उसे पढ़ाना मुश्किल और महंगा हो गया है। सिर्फ एचपीयू के अपने शिक्षा विभाग में संतोषजनक स्थिति है, जिसमें 50 सीटों में से 42 सीटें भरी हैं, हालांकि यहां भी आठ सीटें खाली रह गई हैं। जबकि अन्य 12 संस्थानों की 600 सीटों में से सिर्फ 26 ही सीटें भरी जा सकीं।
इससे जाहिर है कि अब छात्र दो साल का कोर्स हो जाने पर एमएड में रुचि नहीं दिखा रहे हैं। विवि के शिक्षा विभाग की ओर से प्रवेश परीक्षा के आधार पर भरी गई इन सीटों के लिए आवंटित कुल 650 सीटों के लिए 333 ने ही आवेदन किया था।
इनमें से सिर्फ 68 ने ही पात्रता शर्तें पूरी कर प्रवेश लिया, जबकि अन्य प्रवेश परीक्षा में अपीयर हुए छात्रों ने पात्र होने के बावजूद निजी कॉलेजों में प्रवेश लेने की रुचि नहीं दिखाई। इससे बेहतर स्थिति पत्राचार से एमएड के विकल्प के रूप में शुरू किए इक्डोल के एमए एजूकेशन कोर्स में रही है।
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के शिक्षा विभागाध्यक्ष प्रो. सुदर्शना राणा ने माना कि नए सत्र में सिर्फ 68 छात्रों ने ही प्रवेश लिया है। शेष सीटें खाली रह गई है। इसके लिए कोर्स दो साल का होना और फीस बढ़ना ही कारण माना जा रहा है।