जेआरडी टाटा ने 1991 में जब रतन नवल टाटा को अपना उत्तराधिकारी चुना तो उनके लिए यह फैसला उतना आसान नहीं था। उस समय टाटा समूह से जुड़े हुए रूसी मोदी, दरबारी सेठ, सुमंत मूलगांवकर, अजित केरकर और एएच टोबैकोवाला जैसे दिग्गज टाटा सन्स के चेयरमैन पद की कतार में थे।
दूसरी ओर रतन टाटा ने नेलको जैसे छोटी कंपनी में नई जान फूकने के अलावा कुछ अधिक करके नहीं दिखया था। लिहाजा ऐसे में जेआरडी इन दिग्गजों में से किसी को भी समूह का चेयरमैन चुन सकते थे, पर उन्होंने रतन को ही चुना तो इसके पीछे दो बड़ी वजहें थीं। पहली वजह तो बेशक रतन के नाम के आगे ‘टाटा’ लगा होना रहा। दूसरी वजह थी रतन की साफगोई और मुश्किल फैसले लेने का हौसला। कठिन हालात में भी समूह को आगे बढ़ाने के लिए मुश्किल फैसले लेने की इस क्षमता ने ही उन्हें भारत के कारोबारी भरोसे का दूसरा नाम बना दिया।
टाटा मोटर्स को भारी वाहनों के साथ साथ कारों के बाजार में उतारने और कोरस, लैंडरोवर-जगुआर और टेटली जैसी दुनिया की दिग्गज कंपनियों को खरीदने से लेकर सिंगूर में विरोध के बाद नैनो के प्लांट को गुजरात के आणंद में ले जाने तक के चुनौती भरे फैसलों ने टाटा को एक घरेलू कारोबारी घराने से बढ़ा कर दुनिया के छह महाद्वीपों में कारोबार करने वाले औद्योगिक समूह में बदल दिया। आज टाटा समूह की आय साढ़े पांच लाख करोड़ रुपये के स्तर तक पहुंच चुकी है और उसकी 58 फीसदी आय समूह की विदेशी कंपनियों के जरिए आ रही है, तो इसके पीछे टाटा के हौसलों की मजबूती ही खड़ी है।