छोटे कारोबारियों के लिए नई सरकारी खरीद नीति 1 अप्रैल 2012 से लागू कर दी गई है, जिसके तहत सरकारी विभाग और सार्वजनिक उपक्रमों को अपनी कुल खरीददारी का 20 फीसदी हिस्सा छोटे (माइक्रो एंड स्मॉल) कारोबारियों से लेना होगा। शुरुआत के पहले तीन साल यह ऐच्छिक रहेगा, पर अप्रैल 2015 से यह कंपनियों के लिए अनिवार्य हो जाएगा। ऐसे में कारोबारियों के लिए एक निश्चित बिक्री का यह अहम मौका है।
कौन हैं पात्र
माइक्रो और स्मॉल सेक्टर के तहत आने वाले कारोबारी खरीद नीति का हिस्सा होंगे, जिनके उत्पाद केंद्र सरकार के विभागों और सार्वजनिक उपक्रमों को तय मानकों के आधार पर खरीदना होगा। सरकारी खरीद नीति में राज्य सरकार के विभाग या उपक्रम शामिल नहीं हैं।
क्या है योजना
अप्रैल 2012 से लागू सरकारी खरीद नीति में केंद्र सरकार के विभाग और सार्वजनिक उपक्रमों को अपनी कुल खरीददारी की 20 फीसदी खरीददारी छोटे कारोबारियों से करनी है। पहले तीन साल के लिए यह ऐच्छिक है, जबकि अप्रैल 2015 से वह कंपनियों के लिए अनिवार्य होगी। इस 20 फीसदी खरीदारी में से 20 फीसदी खरीददारी आरक्षित होगी। यानी कंपनी अपनी कुल खरीददारी में से चार फीसदी खरीददारी अनुसूचित जाति और जनजाति के तहत आने वाले छोटे कारोबारियों से करेंगी।
वार्षिक रिपोर्ट में ब्योरा अनिवार्य
खरीद नीति के तहत यह प्रावधान है कि सभी सार्वजनिक कंपनियों और सरकारी विभाग को अपनी सालाना रिपोर्ट में छोटे कारोबारियों से की गई कुल खरीदारी का ब्यौरा देना अनिवार्य है। ऐसे में कारोबारी इस संबंध में पूरी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं, साथ ही कंपनियों से खरीदारी के लिए भी कह सकते है।
वेंडर होंगे विकसित
सरकारी विभागों और कंपनियों के उत्पादों की जरूरतें भी खास होती हैं। ऐसे में कंपनियां लक्ष्य पूरा करने के लिए भी नए तरह के वेंडर भी विकसित कर रही हैं। इसे देखते हुए कारोबारी कंपनियों के साथ समझौते कर उनके लिए अपने आपको स्थायी वेंडर के रूप में भी विकसित कर सकते हैं। कंपनियां इसके लिए क्रेता-विक्रेता बैठक आदि के कार्यक्रम भी करती हैं।
लागत में कमी
खरीद नीति के तहत यह प्रावधान है कि कंपनियां कारोबारियों की लागत में कमी करने के लिए निविदा सेट मुफ्त में उपलब्ध कराएं। साथ ही कारोबारियों से अग्रिम पूंजी (अर्नेस्ट मनी) भी नहीं लेने का खरीद नीति में प्रावधान किया गया है।