खादी को नए कलेवर में पेश करने और उनके स्टोर को आधुनिक रूप देने की तैयारी खटाई में पड़ती नजर आ रही है।
पिछले दो साल से लगातार कोशिशों के बावजूद कॉरपोरेट सेक्टर खादी आउटलेट सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) के तहत लेने में रुचि नहीं दिखा रहे हैं।
निजी सेक्टर की बेरुखी को देखते हुए अब सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग मंत्रालय नियमों को ज्यादा लचीला बनाने की तैयारी कर रहा है, जिससे कि कॉरपोरेट सेक्टर अपनी रुचि दिखा सके।
खादी ग्रामोद्योग आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अमर उजाला को बताया कि पीपीपी मॉडल के तहत 20 खादी आउटलेट को निजी कंपनियों को सौंपा जाना था, पर कंपनियों के अभी तक के रुख को देखते हुए इसे मौजूदा स्वरूप में आगे बढ़ाना मुश्किल लग रहा है।
ऐसे में अब 20 की जगह 5-6 खादी स्टोर को ही निजी कंपनियों को सौंपा जा सकता है। साथ ही इन स्टोर में कर्मचारियों को रखने की शर्त भी पहले से उदार की जा सकती है।
अधिकारी के अनुसार अब नए सिरे से तकनीकी बोली के लिए निविदाएं निकाली जाएंगी। उसके बाद चुनी गई कंपनियों को वित्तीय बोली के लिए आमंत्रित किया जाएगा।
यहीं नहीं, उसके बाद भी उम्मीद के मुताबिक निजी कंपनियां आगे नहीं आईं, तो सरकार खुद खादी संस्थान को आधुनिक रूप देने का विकल्प भी तलाश सकती है।
इसके तहत चार-पांच करोड़ रुपये से ज्यादा टर्नओवर वाले खादी स्टोर का रिवाइवल किया जा सकता है।
इसके पहले पूर्व योजना के तहत की गई कवायद में तकनीकी बोली के आगे बात नहीं बन पाई, जिसमें मंत्रालय ने शॉपर स्टॉप, फैब इंडिया सहित तीन कंपनियों का चयन किया था।
खादी स्टोर के रिफार्म के तहत एशियन डेवलपमेंट बैंक के साथ 15 करोड़ रुपये डॉलर का समझौता किया गया है, जिसके तहत पीपीपी मॉडल के तहत खादी संस्थानों को नए रूप में तैयार करना है।
इसके लिए एक नई कंपनी बनेगी, जिसमें 51 फीसदी हिस्सेदारी निजी कंपनी की और 49 फीसदी हिस्सेदारी सरकार में होगी। यहीं नहीं, खादी पर मिलने वाली रिबेट (छूट) भी पीपीपी मॉडल के बाद नहीं रह जाएगी।
कीमत पूरी तरह कंपनियों के जरिए निर्धारित होगी। यानी वह बाजार आधारित हो जाएगी। अभी देश भर में केवीआईसी के 350-400 कर्मचारी और 7,000 के करीब खादी संस्थान हैं।