वैलेंटाइन्स डे महानगरों से होकर गांव की गलियों तक पहुंच गया है, प्रेम प्रदर्शन के लिए तमाम नए उपाय तलाशे जा रहे हैं लेकिन महाकुंभ में जुटे संतों ने दिन, समय और दिखावे में बंधे किसी प्रेम की अवधारणा को ही खारिज कर दिया है।
संतों की राय है कि प्रेम के लिए वैलेंटाइन्स डे जैसे किसी दिन की जरूरत नहीं। प्रेम दिखावे की चीज नहीं होती, यह अंतस में बसने वाला भाव है। दिखावे के प्रेम को लेकर संतों ने ऐतराज जताया है। उनकी राय में प्रेम की मर्यादा होती है, जिसे संभालना बड़ी साधना से कम नहीं है। प्रेम पवित्र, मर्यादित, संयमित भाव है जो सभी करते हैं।
आत्मा के स्पर्श का नाम प्रेम
जूना पीठाधीश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि मानते हैं कि प्रेम, मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। प्रेम से देह नहीं छुई जा सकती, यह आत्मा के स्पर्श का नाम है। प्रेम पवित्र और संयत तत्व है। हम इसके बिना नहीं रह सकते हैं। उनकी राय में प्रेम व्यक्ति की उच्चतम साधना है। जो इसकी मर्यादा को संभालकर रख सकता है, वही प्रेम कर सकता है।
प्रेम की कोई परिधि नहीं
संत अवधेशानंद की नजर में एक दिन, सात दिन या 15 दिन का पर्व प्रेम पर्व नहीं, बाजारू गणित है। प्रेम को किसी परिधि में नहीं बांधा जा सकता है। हमारी संस्कृति में तो हर पल प्रेम है, हम ईश्वर, प्रकृति और मनुष्य के प्रति हर पल प्रेम करते हैं।
शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के प्रतिनिधि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती कहते हैं कि कर्म और विचारों को आत्मा की ऊंचाई तक पहुंचाना प्रेम है। शिव और गंगा की तरह जिसने भी प्रेम की मर्यादा का पालन किया, अमर हो गया।
'परिभाषा और सीमा में बांधना उचित नहीं'
अग्नि अखाड़े के सचिव श्रीमहंत कैलाशानंद ब्रह्मचारी मानते हैं, प्रेम के बिना जीवन संभव नहीं है लेकिन न तो इसे किसी परिभाषा और सीमा में बांधना उचित है और न ही इसे दर्शन की वस्तु बनने देना चाहिए। प्रेम में भावपक्ष की प्रधानता जरूरी है।
परमार्थ निकेतन की साध्वी भगवती सरस्वती मानती हैं कि प्रेम मन तथा भावना की दूरियां मिटाने का नाम है। उनके मुताबिक जब ऐसी दृष्टि बन जाए कि मैं और हम का भेद न रहे, उसे सच्चा प्रेम कहेंगे। जैसे हम अपनी चिंता करते हैं, वैसी ही किसी और की करने लगें तो कह सकते हैं कि उससे प्रेम करते हैं। यदि उसे अपने से अलग दृष्टि से देखते हैं तो वह व्यक्ति नहीं वस्तु होकर रह जाता है।
प्रेम, आनंद की प्राप्ति का नाम
संन्यासिनी अखाड़े की अध्यक्ष देव्या गिरि कहती हैं कि प्रेम अंतस का भाव है जिसके लिए कोई दिन नहीं निर्धारित किया जा सकता है। प्रेम का देह से कोई नाता नहीं है। जिसे हर पल प्रेम चाहिए, वही इसका असली मर्म समझ सकता है। प्रेम का अर्थ ऐसी शांति है, जो किसी से बात करके, उससे मिलकर या उसे देखकर मिल सकती है। प्रेम की विशेषता यह कि उसे हम बार-बार नए रूप में देखते हैं। प्रेम, आनंद की प्राप्ति का नाम है न कि बाजारू वस्तु जुटाने का।