मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में मंगलवार को एक प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल रमेश बैस से मुलाकात की। प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल से सरकारी नौकरियों में आरक्षण और खतियान आधारित अधिवास स्थिति के निर्धारण पर दो विधेयकों केंद्र को भेजने का आग्रह किया।
सोरेन ने कहा, भाजपा के प्रतिनिधियों को छोड़कर राज्य के सभी राजनीतिक दल (झामुमो, कांग्रेस, वाम दल और आजसू) प्रतिनिधिमंडल में शामिल हुए। बैठक के बाद उन्होंने संवाददाताओं से कहा, झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य की भर्ती नीति को रद्द कर दिया था। राज्य विधानसभा ने 11 नवंबर को दो विधेयक पारित किए। एक, राज्य में सरकारी नौकरियों में आरक्षण का कोटा बढ़ाकर 77 फीसदी कर दिया गया, जिसमें ओबीसी के लिए 27 फीसदी आरक्षण भी शामिल है और दूसरा 1932 खतियान (भू-अभिलेख) आधारित अधिवास। हमने राज्यपाल से उन्हें मंजूरी देने और संवैधानिक ढाल प्रदान करने के लिए केंद्र को भेजने का अनुरोध किया।
दोनों विधेयक, 'पदों और सेवाओं की रिक्तियों में झारखंड आरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2022' और 'झारखंड स्थानीय व्यक्तियों की परिभाषा और परिणामी सामाजिक, सांस्कृतिक और अन्य लाभों को ऐशे व्यक्तियों तक विस्तारित करने क लिए अधिनियम, 2022' इस चेतावनी के साथ आया था कि इन्हें संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल किए जाने के बाद प्रभावी किया जाएगा।
संविधान की नौवीं अनुसूची में केंद्रीय और राज्य कानूनों की एक सूची है, जिन्हें अदालतों में चुनौती नहीं दी जा सकती है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि राज्य के युवाओं को तीसरे और चौथे दर्जे के पदों पर रोजगार नहीं मिल रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि यहां सक्रिय एक 'गिरोह' द्वारा स्थानीय लोगों को उनके अधिकारों से वंचित करने की साजिश रची गई है।
उन्होंने कहा, राज्य में कुछ ताकतें सक्रिय हैं जो स्थानीय लोगों के अधिकारों को छीनने की कोशिश कर रही है। हाईकोर्ट में भर्ती नीति मामले के खिलाफ बीस शिकायतकर्ताओं में से 19 अन्य राज्यों के थे।