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कृषि कानूनों की वापसी: लट्ठ, काला कपड़ा और खुफिया रिपोर्ट, चुनाव की दहलीज पर संभल गई खूनी संघर्ष की कहानी

सार

किसान नेता मानते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी ने अगर तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की बात कही है तो उसके पीछे बड़ा दबाव रहा है। लिहाजा किसानों ने पहले ही यह बात कह दी थी कि भाजपा सरकार के मंत्रियों, सांसदों, विधायकों और पार्टी पदाधिकारियों का घेराव किया जाएगा। उन्हें काले झंडे दिखाएंगे...
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किसान आंदोलन - फोटो : PTI (File Photo)
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विस्तार
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किसान आंदोलन, 26 नवंबर को दूसरे साल में प्रवेश कर जाएगा। 29 नवंबर से संसद का शीतकालीन सत्र शुरू हो रहा है। संयुक्त किसान मोर्चा 'एसकेएम' ने एलान किया था कि 29 नवंबर से संसद सत्र के अंत तक 500 चयनित किसान, ट्रैक्टर ट्रॉलियों में रोजाना शांतिपूर्ण और पूरे अनुशासन के साथ संसद भवन तक पहुंचेंगे। किसानों को दिल्ली में प्रवेश नहीं करने दिया जाएगा, ये बात तय थी। इससे किसान आंदोलन उग्र हो उठता, जिसका नतीजा अच्छा नहीं मिलता। किसान नेता मानते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी ने अगर तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की बात कही है तो उसके पीछे बड़ा दबाव रहा है। लिहाजा किसानों ने पहले ही यह बात कह दी थी कि भाजपा सरकार के मंत्रियों, सांसदों, विधायकों और पार्टी पदाधिकारियों का घेराव किया जाएगा। उन्हें काले झंडे दिखाएंगे।

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भाजपा नेताओं के सार्वजनिक कार्यक्रमों में अलग से पुलिस बल तैनात करना पड़ता था। किसान आंदोलन में 'लट्ठ, काला कपड़ा व खुफिया रिपोर्ट' ने नेताओं को संभलकर चलने के लिए मजबूर कर दिया। भाजपा नेताओं को कई घंटे तक वहीं रोक दिया जाता। सुरक्षा एजेंसियों के पास ऐसे अलर्ट आते रहे हैं कि अगर चुनाव में भी किसान लट्ठ लेकर नेताओं को काले झंडे दिखाते तो कहानी 'खूनी संघर्ष' की तरफ बढ़नी तय थी। इसका खामियाजा सरकार और किसान, दोनों को भुगतना पड़ता।

भाजपा नेताओं की सुरक्षा के लिए लगानी पड़ी अतिरिक्त फोर्स

दरअसल, किसान संगठनों ने चार-पांच माह पहले ही स्पष्ट तौर पर यह बात कह दी थी कि ग्रामीण क्षेत्रों में भाजपा के मंत्रियों और पदाधिकारियों का घेराव किया जाएगा। इस बात पर अमल भी शुरू हो गया था। उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तराखंड और मध्यप्रदेश में भाजपा नेताओं को काले झंडे दिखाए गए। यहां तक कि कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और गृह राज्य मंत्री अजय मिश्र 'टेनी' को भी किसानों के विरोध का सामना करना पड़ा। केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान को गांव में नहीं घुसने दिया गया। किसानों के हाथ में लट्ठ और काले झंडे थे।

दूसरी तरफ किसानों के विरोध को लेकर पुलिस महकमे के पास ठोस खुफिया रिपोर्ट थी। नतीजा, पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान व दिल्ली में किसानों पर नजर रखने के लिए अतिरिक्त पुलिस बलों की तैनाती करनी पड़ी। लोकल पुलिस की कुल संख्या में से करीब 30 फीसदी हिस्सा किसानों के हल्लाबोल में लगाना पड़ रहा था। कई जगहों पर केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती करनी पड़ी। इस तरह दूसरी जगहों पर पुलिस और किसानों के बीच झड़पें हो रही थीं।

मुख्यमंत्री मनोहरलाल का हेलीकॉप्टर तक नहीं उतरने दिया

भाजपा नेताओं को किसानों के विरोध का सामना, कहां पर और किस तरह करना पड़ सकता है, ये किसी को मालूम नहीं होता था। हालांकि खुफिया जानकारी जुटाने में लगा रहता था। लोकल सीआईडी के अलावा आईबी भी सक्रिय रहती थी। हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश व राजस्थान में खुफिया तंत्र को खासी मशक्कत करनी पड़ रही थी। खासतौर पर भाजपा शासित प्रांतों में खुफिया विभाग का ग्रीन सिग्नल मिलने के बाद ही भाजपाई बाहर निकल रहे थे। करनाल में किसानों ने मुख्यमंत्री मनोहर लाल का हेलीकॉप्टर तक नहीं उतरने दिया। उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला कई घंटे तक हिसार एयरपोर्ट पर फंसे रहे।

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भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष ओपी धनखड़ को भी इसी तरह से किसानों का आक्रोश झेलना पड़ा। हांसी में राज्यसभा सांसद रामचंद्र जांगड़ा पर मामला दर्ज कराने के लिए किसान अड़े हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसानों का विरोध इतना ज्यादा था कि वहां केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान और दूसरे नेताओं का कथित तौर पर बहिष्कार कर दिया गया। शादी इत्यादि में भी किसान उन्हें बुलाने से परहेज करने लगे। किसानों और खाप चौधरियों से बातचीत करने के लिए जब संजीव बालियान मुजफ्फरनगर और शामली पहुंचे तो उन्हें किसानों की खासी नाराजगी झेलनी पड़ी। शामली जिले के लिलोन गांव में तो खाप चौधरियों ने उनसे मिलने से ही मना कर दिया। भैंसवाल गांव में उन्हें घुसने ही नहीं दिया गया। संजीव बालियान के साथ उत्तर प्रदेश के पंचायती राज मंत्री भूपेंद्र चौधरी, बुढ़ाना से भाजपा विधायक उमेश मलिक, शामली विधायक तेजेंद्र निर्वाल और प्रसन्न चौधरी को भी आंदोलनकारी किसानों की नाराजगी झेलनी पड़ी।

चुनाव के दौरान खूनी संघर्ष में बदल सकता था 'हल्लाबोल'

खुफिया महकमे के एक अधिकारी के मुताबिक, अभी किसान संगठनों द्वारा नेताओं का कई तरीके से विरोध किया जा रहा था। काले झंडे के तौर पर काले कपड़े का इस्तेमाल किया जाता था। नेताओं का जहां कहीं भी सार्वजनिक कार्यक्रम होता, किसान आंदोलन से जुड़े लोग वहीं पहुंच जाते। कई बार वे पहले से ही वहां मौजूद रहते थे। जैसे ही मंत्री या विधायक वहां पहुंचते, किसान उनके खिलाफ काले कपड़े दिखाते हुए नारेबाजी शुरू कर देते थे। जब किसान, वीआईपी गाड़ी के पास आने का प्रयास करते तो उनकी पुलिस के साथ झड़प हो जाती थी। अगले साल उत्तर प्रदेश, पंजाब व उत्तराखंड सहित कई दूसरे राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं। किसान आंदोलन ने पहले ही यह घोषणा कर रखी थी कि वे राजनीतिक दल विशेष के नेताओं का विरोध करेंगे। चूंकि चुनावी अभियान के दौरान नेता के साथ कार्यकर्ताओं की भारी संख्या मौजूद रहती है, इसलिए दोनों पक्षों के बीच बड़े टकराव की आशंका बनी रहती है। खालिस्तान जैसे राष्ट्र विरोधी संगठन, उस स्थिति का फायदा उठा सकते हैं। वे किसानों और नेताओं की कहासुनी को उग्र तनाव की तरफ ले जा सकते हैं। प्रधानमंत्री मोदी की तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा के साथ अब पुलिस महकमे ने भी राहत की सांस ली है।

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