इस घटना के बाद मुझे एक बात समझ में आ गई कि कई लोग हैं, जो जानवरों की मदद करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें पता ही नहीं चलता कि कब, कहां और किस जानवर को कैसी आवश्यकता है। लोग मदद के लिए आम तौर पर फेसबुक पोस्ट का प्रयोग करते हैं। अपने दोस्तों को टैग करते हैं, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक किसी भी जानवर की जानकारी पहुंचाई जाए। लेकिन कई बार या यों कहें अधिकतर यही होता है कि जानवर को जरूरत आज होती है और मदद करने वाले तक इसकी जानकारी तीन दिन बाद पहुंचती है। इस दिशा में काम करने वाले अनेक एनजीओ भी सही वक्त पर मदद नहीं कर पाते हैं। एक रियल टाइम मंच का अभाव ही मेरे दिमाग में नया आइडिया लाया। आईटी इंजीनियर होने के नाते मेरे लिए ऐसा मोबाइल ऐप बनाना ज्यादा मुश्किल नहीं था।
घर वालों को मेरे काम से कोई दिक्कत नहीं थी। उल्टे उनके लिए खुशी की बात थी कि मैं बेजुबानों के लिए कुछ करना चाहता हूं। अभी साल भर भी नहीं बीता है, जब मैंने लेट इट वैग नाम की एप्लीकेशन लांच की थी। इस एप्लीकेशन की खास बात यह है कि इस पर न सिर्फ किसी दुर्घटना की जानकारी सभी पशु प्रेमियों तक एक साथ एक ही वक्त में पहुंच जाती है, बल्कि दूसरे अन्य बचावकर्ता, पशु चिकित्सक और गैर सरकारी संगठनों की भी जानकारी उपलब्ध है।
मेरा मकसद यही था कि कोई भी बेजुबानों का हमदर्द किसी भी जरूरतमंद जानवर की मदद करने से पहले किसी अन्य चीज की फिक्र न करे। ऐप की वजह से अब तक एक हजार से ज्यादा पशुओं की मदद की जा सकी है। मेरे ऐप की मदद से जानवरों या पक्षियों को गोद भी लिया जा सकता है। अब तक दस लोग ऐसा कर चुके हैं। विभिन्न फिल्मी सितारों समेत कई विदेशी लोगों ने मेरे काम की तारीफ की है, मगर मेरे लिए तसल्ली की बात यही है कि मेरे काम की वजह से उनको मदद मिल रही है, जो अपनी व्यथा किसी से कह नहीं सकते।