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घायल जानवरों की 'रियल टाइम' मदद करके खेल रहा हूं जिंदगी का 'स्ट्रोक'

Mon, 16 Jul 2018 01:43 PM IST
यश सेठ
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मैंने पहले से ही सोच रखा था कि इंजीनियरिंग करने के बाद नौकरी करने के बजाय खुद का स्टार्ट-अप शुरू करूंगा। लेकिन हमेशा हर चीज मन-मुताबिक भला कहां मिलती है! मेरी पढ़ाई छह साल पहले पूरी हुई। एक-आध साल प्रशिक्षण आदि करने के बाद 2014 में मैंने एक स्टार्ट-अप की शुरुआत की, लेकिन बदकिस्मती से वह काम नहीं चला। इसी बीच मेरे दिमाग में एक नया विचार आया। ऐसा विचार, जो न सिर्फ मेरा दूसरा स्टार्ट-अप हो सकता था, बल्कि मेरे दिल के भी बहुत करीब था।

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अब इसे जैन धर्म के अनुयायी होने की वजह मानें या फिर कुछ और, मुझे जानवरों, खासकर कुत्तों के प्रति शुरू से ही प्यार रहा है। अपने दोस्त के साथ मिलकर मैंने अब तक आधा दर्जन से ज्यादा कुत्ते पाले हैं। उस दिन मैं मुंबई स्थित अपने घर की खिड़की से बाहर देख रहा था। अचानक नीचे सड़क पर मैंने एक कुत्ते को चिल्लाते देखा। ऊपर से ही साफ दिख रहा था कि कुत्ता दर्द के मारे कराह रहा है। कुत्ते की मदद करने के इरादे से मैं तत्काल नीचे उतरा।

कुत्ते की बुरी हालत देख मैंने तुरंत ही स्थानीय पशु चिकित्सक को फोन लगाया, लेकिन मुझे इसका कोई फायदा नहीं मिला। फिर मैंने एक एंबुलेंस बुलानी चाही। एंबुलेंस वालों ने जवाब या कि वे कब तक पहुंचेंगे, यह तय नहीं है। कुछ देर बाद मैंने अपनी ही तरह के एक दूसरे लड़के की मदद से एक सशुल्क एंबुलेंस मंगाई, जिसका खर्च आया कुल आठ सौ रुपये।

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'लेट इट वैग' नाम की एप्लीकेशन लांच की

इस घटना के बाद मुझे एक बात समझ में आ गई कि कई लोग हैं, जो जानवरों की मदद करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें पता ही नहीं चलता कि कब, कहां और किस जानवर को कैसी आवश्यकता है। लोग मदद के लिए आम तौर पर फेसबुक पोस्ट का प्रयोग करते हैं। अपने दोस्तों को टैग करते हैं, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक किसी भी जानवर की जानकारी पहुंचाई जाए। लेकिन कई बार या यों कहें अधिकतर यही होता है कि जानवर को जरूरत आज होती है और मदद करने वाले तक इसकी जानकारी तीन दिन बाद पहुंचती है। इस दिशा में काम करने वाले अनेक एनजीओ भी सही वक्त पर मदद नहीं कर पाते हैं। एक रियल टाइम मंच का अभाव ही मेरे दिमाग में नया आइडिया लाया। आईटी इंजीनियर होने के नाते मेरे लिए ऐसा मोबाइल ऐप बनाना ज्यादा मुश्किल नहीं था।

घर वालों को मेरे काम से कोई दिक्कत नहीं थी। उल्टे उनके लिए खुशी की बात थी कि मैं बेजुबानों के लिए कुछ करना चाहता हूं। अभी साल भर भी नहीं बीता है, जब मैंने लेट इट वैग नाम की एप्लीकेशन लांच की थी। इस एप्लीकेशन की खास बात यह है कि इस पर न सिर्फ किसी दुर्घटना की जानकारी सभी पशु प्रेमियों तक एक साथ एक ही वक्त में पहुंच जाती है, बल्कि दूसरे अन्य बचावकर्ता, पशु चिकित्सक और गैर सरकारी संगठनों की भी जानकारी उपलब्ध है। 

मेरा मकसद यही था कि कोई भी बेजुबानों का हमदर्द किसी भी जरूरतमंद जानवर की मदद करने से पहले किसी अन्य चीज की फिक्र न करे। ऐप की वजह से अब तक एक हजार से ज्यादा पशुओं की मदद की जा सकी है। मेरे ऐप की मदद से जानवरों या पक्षियों को गोद भी लिया जा सकता है। अब तक दस लोग ऐसा कर चुके हैं। विभिन्न फिल्मी सितारों समेत कई विदेशी लोगों ने मेरे काम की तारीफ की है, मगर मेरे लिए तसल्ली की बात यही है कि मेरे काम की वजह से उनको मदद मिल रही है, जो अपनी व्यथा किसी से कह नहीं सकते।
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