उन्होंने न सिर्फ मुझे इजाजत दी, बल्कि मेरी आर्थिक मदद भी की। और मैं हफ्ते में कम से कम दो-तीन बार दर्जनों गरीबों को खाना खिलाने लगा। आज मैं लोगों को जो भी खाना खिलाता हूं, वह स्वास्थ्य के मानकों पर खरा होता है। मैं करीब हजार लोगों के लिए पास के एक होटल से नाश्ता तैयार कराता हूं। मेरा काम देखते हुए होटल ने नाश्ते की दर बहुत कम रखी है, फिर भी हर दिन साढ़े तीन हजार रुपये का खर्च आता है।
डिस्पोजल प्लेट और दूसरे मदों में अलग से पांच सौ रुपये खर्च होते हैं। ये सारे खर्च करीब डेढ़ वर्ष पहले अस्तित्व में आई मेरी संस्था ह्यूमैनिटी फर्स्ट फाउंडेशन को मिले चंदे से पूरे होते हैं। संस्था बनी, तो मैंने कई दूसरे तरह के काम भी शुरू कर दिए। मसलन, सड़कों पर छोड़ दिए गए लोगों की मदद करना और फुटपाथों पर रहने वाले गरीबों तक दूसरी तरह की सहायता पहुंचाना।
जीने की उम्मीद खो चुके ऐसे लोगों को हम जीवन की खूबसूरती के बारे में समझाते हैं। दान दाताओं के सहयोग के साथ, मैं झुग्गी-झोपड़ियां में नियमित चिकित्सा शिविरों का आयोजन कराता हूं और चेक-अप के बाद नि:शुल्क दवाइयां भी बांटता हूं। मेरा मानना है कि पच्चीस लोगों के परिवार का सदस्य होने के नाते किसी को भी कई तरह की दिक्कतें हो सकती हैं, मगर उसे चीजें साझा करने का शानदार अनुभव भी हासिल होता
है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।