जंगल में रहने वाले आदिवासियों तक शौचालय पहुंचाने के लिए मैंने एक ठेकेदार को काम का ठेका लेने के लिए मना लिया। मैंने उससे कहा कि मैं बिना सड़क के जरूरी निर्माण सामग्री जंगलों के बीच उन गांवों तक पहुंचा सकती हूं। दरअसल जंगल में एक नदी गुजरती है और मैंने इसी नदी में नाव के सहारे सामान पहुंचाने का सोचा था। मैंने ऐसा ही किया। मुझे मात्र तीन महीने लगे और देखते ही देखते अलग-अलग जंगली बस्तियों में पांच सौ के करीब शौचालय बनकर तैयार हो गए।
हालांकि नाव वाली योजना में कई मौके ऐसे आए, जब निर्माण सामग्री पानी में बह गई। ऐसी घटनाओं से काम के बजट पर असर पड़ा, लेकिन मैंने प्रयास करके स्थानीय प्राधिकरणों से धन का इंतजाम करा दिया। मेरी भूमिका शौचालय बनवाने तक ही नहीं रही, बल्कि इसके प्रयोग को लेकर मैंने आदिवासियों के बीच तीन दिवसीय जागरूकता कार्यक्रम भी चलाया। उन्हें समझाया कि कैसे शौचालय को स्वच्छ रखना है। उनकी वर्षों की आदत बदलने में मुझे थोड़ा वक्त लगा, लेकिन आखिरकार वह समय आ ही गया, जब ये इलाके खुले में शौच से पूरी तरह मुक्त हो गए।
शौचालय बनवाने में अपना योगदान देना मेरे काम के दायरे में नहीं आता था। मैं चाहती, तो केवल अपना काम करके चुपचाप आराम से रह सकती थी। लेकिन इसके बजाय मैंने उन आदिवासियों के बारे में सोचा। इसी का परिणाम है कि राज्य के मुख्यमंत्री ने सर्वश्रेष्ठ वन्य अधिकारी के पुरस्कार से भी मुझे सम्मानित किया। मुझे नहीं पता कि उन तक सड़क समेत अन्य जरूरतों की पहुंच कब होगी, लेकिन जो पहुंचा है, उसे देखकर खुशी होती है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।