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नाव से सामान ढोकर जंगल में बनाए शौचालय, अदिवासियों के लिए बनी मसीहा

Mon, 26 Mar 2018 01:43 PM IST
पी जी सुधा
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PG Sudha
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केरल में एर्नाकुलम जिले के जिन जंगली इलाकों में मैं काम करती हूं, वे मानव अस्तित्व के लिहाज से काफी चुनौतीपूर्ण हैं। यहां रहने वाले आदिवासियों का शहरी रहन-सहन और ऐशो-आराम से कोई वास्ता नहीं है। लेकिन ये इलाके आज की तारीख में खुले में शौच जैसी असभ्य प्रथा से पूरी तरह मुक्त हो चुके हैं। मैं इन जंगलों में काम करने वाली पचास वर्षीय वन बीट अधिकारी हूं।

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काम की शुरुआत से ही मैं जंगलों में रहने वाले जनजातीय बाशिंदों की दिनचर्या से अच्छी तरह वाकिफ हूं। वनों में ये लोग किस तरह जीवन जीते हैं, शहरों के वातानुकूलित कमरों में बैठने वाले उसकी कल्पना तक नहीं कर सकते। ऐसा भी नहीं है कि इनके भीतर अपना जीवन स्तर ऊंचा करने की इच्छा पैदा नहीं होती। और ये लोग शौचालय बनवाने की क्षमता भी रखते थे, मगर कई तरह की मुश्किलों के आगे समर्पण करने में उनकी इच्छाओं को देर नहीं लगती थी, जिसका कारण है इन सूदूर जंगलों में किसी निर्माण कार्य के लिए जरूरी सामान की पहुंच न होना। सड़कों के नाम पर जंगली पगडंडियां अपने ऊपर चलने के लिए किसी भार वाहन को अनुमति नहीं देतीं! 

इसी बीच सरकारी स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत देश के उन इलाकों पर ध्यान दिया जाने लगा, जहां लोग अब भी खुले में शौच करते थे। एर्नाकुलम के इन जंगलों पर भी सरकार का ध्यान गया। लेकिन यातायात की पुरानी दिक्कत अभी तक बरकरार थी। इस काम के लिए कोई भी ठेकेदार राजी नहीं हो रहा था। चूंकि मैं वहां पहले से ही काम कर रही थी, इसलिए वहां की भौगोलिक संरचना अच्छी तरह से जानती थी, इसलिए मैंने सोचा कि मैं इस समस्या का कोई न कोई समाधान निकाल सकती हूं।

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जंगल में रहने वाले आदिवासियों तक शौचालय पहुंचाने के लिए मैंने एक ठेकेदार को काम का ठेका लेने के लिए मना लिया। मैंने उससे कहा कि मैं बिना सड़क के जरूरी निर्माण सामग्री जंगलों के बीच उन गांवों तक पहुंचा सकती हूं। दरअसल जंगल में एक नदी गुजरती है और मैंने इसी नदी में नाव के सहारे सामान पहुंचाने का सोचा था। मैंने ऐसा ही किया। मुझे मात्र तीन महीने लगे और देखते ही देखते अलग-अलग जंगली बस्तियों में पांच सौ के करीब शौचालय बनकर तैयार हो गए।

हालांकि नाव वाली योजना में कई मौके ऐसे आए, जब निर्माण सामग्री पानी में बह गई। ऐसी घटनाओं से काम के बजट पर असर पड़ा, लेकिन मैंने प्रयास करके स्थानीय प्राधिकरणों से धन का इंतजाम करा दिया। मेरी भूमिका शौचालय बनवाने तक ही नहीं रही, बल्कि इसके प्रयोग को लेकर मैंने आदिवासियों के बीच तीन दिवसीय जागरूकता कार्यक्रम भी चलाया। उन्हें समझाया कि कैसे शौचालय को स्वच्छ रखना है। उनकी वर्षों की आदत बदलने में मुझे थोड़ा वक्त लगा, लेकिन आखिरकार वह समय आ ही गया, जब ये इलाके खुले में शौच से पूरी तरह मुक्त हो गए।

शौचालय बनवाने में अपना योगदान देना मेरे काम के दायरे में नहीं आता था। मैं चाहती, तो केवल अपना काम करके चुपचाप आराम से रह सकती थी। लेकिन इसके बजाय मैंने उन आदिवासियों के बारे में सोचा। इसी का परिणाम है कि राज्य के मुख्यमंत्री ने सर्वश्रेष्ठ वन्य अधिकारी के पुरस्कार से भी मुझे सम्मानित किया। मुझे नहीं पता कि उन तक सड़क समेत अन्य जरूरतों की पहुंच कब होगी, लेकिन जो पहुंचा है, उसे देखकर खुशी होती है। 
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
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