मैं केवल ग्यारह साल का था। भिखारी बनने का वह मेरा पहला दिन था। पिछले अड़तालीस घंटे से मेरा पेट भोजन के लिए तरस रहा था। अपनी भूख मिटाने के लिए दिन भर भीख मांगने के बाद मुझे एक व्यक्ति से भीख नसीब हुई। भीख पाकर मैं सड़क किनारे बैठकर रोने लगा। उस दिन मैं किसी सामान्य बच्चे की छवि से निकलकर एक भिखारी बन गया था।
मुझे ऐसा महसूस हो रहा था कि मेरी कोई अमूल्य चीज मुझसे छीनी जा रही है। मैं उन सारे चेहरों को भूलना चाहता था, जिनसे मैंने पूरे दिन भीख मांगी थी, मगर मैं ऐसा कर न सका। अगले दिन की भूख ने न चाहते हुए मेरे नन्हें हाथों को दूसरों के आगे फैलाने के लिए विवश कर दिया। केवल अगले दिन ही क्यों, कई महीनों तक मेरा यही काम जारी रहा।
तब तक मैं बच्चा नहीं रह गया था। मसलन बाल मन की सभी आकांक्षाएं मेरे शरीर से प्रवास कर गई थीं। अच्छा महसूस करना क्या होता है, मैं भूलने लगा था। दूसरे लोग भी इसके जिम्मेदार थे। सबके-सब मुझे भिखारी पुकारने लगे थे। बड़ी आसानी से मैंने भी उस सच्चाई को स्वीकार कर लिया था। अपना परिचय भिखारी के तौर पर खुशी-खुशी देने लगा था।
लेकिन जल्द ही मुझे एक नकली भिखारी बनना पड़ा। दरअसल भीख मांगना मेरी आदत बन चुका था। मैं भीख के पैसों से ही खुश रहना सीख गया था और कभी-कभार हंसते हुए ही लोगों से भीख मांगता। लेकिन मेरा प्राकृतिक स्वभाव किसी को भीख देने के लिए प्रेरित ही नहीं करता। कोई भीख देना भी चाहता, तो मेरी मुस्कराहट देखकर हाथ पीछे कर लेता।
छोटी-सी उम्र में ही मैं समझ गया कि दुनिया कितनी नकली है। मैंने भीख मांगते वक्त दुखी चेहरा बनाना सीख लिया। जिससे भीख मांगता, उसका चेहरा भी नहीं देखता, केवल अपने पैर देखता रहता। मगर मैं इतना बड़ा कलाप्रेमी था नहीं, जो इस अभिनय को झेल सकूं। झूठे चेहरे के कारण मैं हर दिन बुरा महसूस करता।