बात तब की है, जब मैं कानपुर में एमए की पढ़ाई कर रहा था। कॉलेज के पास एक पुलिस चौकी थी, जिसकी इंचार्ज एक महिला इंस्पेक्टर थी। वह इंस्पेक्टर जब भी हमारे कॉलेज के आसपास दिखती, कॉलेज के लड़कों के मन में दहशत की एक लहर दौड़ जाती। कुछ ऐसा ही अनुभव मैंने गृह जनपद इटावा से बीएससी करने के दौरान भी किया, जब एक इंस्पेक्टर घोड़े पर सवार होकर पूरे मोहल्ले के लड़कों को उनके घरों में कैद रहने पर मजबूर कर देता था।
पुलिस में आने के पीछे इस रुतबे का नजारा बड़ी वजह रही। नहीं तो, जिस परिवार के कुल ग्यारह सदस्य प्रशासनिक अधिकारी हों, उसका कोई सदस्य पुलिस में क्यों आना चाहेगा! 1990 में पुलिस में भर्ती होने के बाद मेरी पहली तैनाती मेरठ में हुई। नौकरी की शुरुआत में लगा कि गलत जगह आ गया। लगता भी क्यों नहीं, न मांसाहार, न ही शराब, किसी पुलिस वाले की ऐसी दिनचर्या उसे ऐसा ही एहसास दिलाएगी। तीन साल ही बीते थे कि मुझे अपनी नौकरी में एमफिल तक की पढ़ाई का प्रयोग करने का मौका मिला।
हुआ यों कि मेरे थाना क्षेत्र में एक परिवार के लड़के का अपहरण कर लिया गया था। अपहरणकर्ता पीड़ित परिवार से फिरौती मांग रहे थे। मुझे अपनी ड्यूटी निभाते हुए बदमाशों को पकड़ना था। मैं अपना काम दफ्तर में रहते हुए औपचारिक ढंग से कर सकता था, पर मैंने उस पीड़ित परिवार के घर में रहकर इस मामले को देखने का फैसला किया, ताकि अपहरणकर्ताओं द्वारा परिवार से की जा रही समस्त बातचीत का मैं हिस्सा बन सकूं। उस समय तकनीक भी इतनी उन्नत नहीं थी कि इससे निगरानी में मदद मिले।
खैर, मैंने अपना कर्तव्य निभाते हुए अपहृत लड़के को सकुशल ढूंढ निकाला। मगर पीड़ित परिवार का हिस्सा बनकर मैंने पहली बार किसी बच्चे के गायब होने की वेदना महसूस की। मुझे पता चला कि बच्चा गायब होना कितना बड़ा अपराध है, मेरे हिसाब से शायद सबसे बड़ा। इसके बाद मैंने हमेशा गायब बच्चों को उनके परिवार से मिलाने के काम को अपनी ड्यूटी की प्राथमिकता में रखा।
दो साल बाद मेरठ के ही एक अन्य मामले में मैंने एक ऐसे बच्चे को उसके घर तक पहुंचाने में मदद की, जो रोज मुझे थाने में चाय पिलाता था। मैंने छुट्टी लेकर उसे उसके गांव तक पहुंचाया था। उसके मां-बाप ने मुझसे लिपटकर मुझे धन्यवाद किया। उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि कोई पुलिसवाला इस तरह से किसी गरीब परिवार की मदद कर सकता है। उस दिन अपने काम से मिली संतुष्टि ने मुझे और प्रेरित किया।
सुखद संयोग ही था कि कुछ ही समय बाद राज्य के पुलिस विभाग ने भी ऑपरेशन स्माइल नाम से पूरे प्रदेश में गायब बच्चों को ढूंढने का अभियान चलाया। इस अभियान से पहले और बाद में मैंने अपने स्तर पर अब तक सभी तैनातियों में आधिकारिक तौर पर कुल एक सौ एक बच्चों को उनके परिवार से मिलाया है। इसके अलावा सामान्य जिंदगी में कई ऐसे भी बच्चे मिले हैं, जो घरवालों को बिना बताए भागकर दूसरी जगह आ गए हैं, उन्हें भी समझाकर उनकी घर वापसी सुनिश्चित करने का प्रयास करता हूं।
पुलिस की बदनाम छवि से इतर मेरे काम का कई लोगों ने उपहास भी बनाया, लेकिन मैंने ऐसी बातों पर ध्यान नहीं दिया। मैं दुर्घटनाओं में घायल लोगों को तत्काल चिकित्सीय मदद के लिए भी लोगों को प्रोत्साहित करता रहता हूं। मैं चाहता हूं कि लोगों में पुलिस को लेकर बनी गलत छवि में बदलाव आए।