स्वयं सहायता और सहकारिता के मॉडल में मैंने कुछ छोटे किसानों को अपने साथ लिया। हर किसान को उत्पादन से लेकर विपणन तक की जिम्मेदारी खुद निभानी थी। मेरा काम यह था कि इस प्रकिया में सब कुछ टिकाऊ, स्थानीय और उपयोगी हो, मतलब फसल से जुड़ी हर चीज का प्रयोग हो। इसके अलावा मैंने किसानों को नियमित स्तर पर प्रशिक्षण दिया, जिसमें खेती से जुड़ी नवीनतम तकनीकी ज्ञान शामिल था। मैं शहरी जरूरतों को बेहतर तरीके से समझती थी।
मुझे पता था कि शहरी लोग देसी चीजों को इतनी आसानी से स्वीकार नहीं करेंगे, इसलिए मैंने अनेक कृषि उत्पादों को इस तरह से तैयार कराया, जो लोगों को आकर्षक लगें। कुछ ऐसे बाई प्रोडक्ट्स को, जिन्हें किसान बेकार समझ कर बहुत कम मूल्य पर बेच देते, मैंने अपनी योजनाओं से नई कीमत प्रदान की। इस तरह बहुत कम समय में हमने बफैलो बैक कलेक्टिव के माध्यम से खासी सफलता हासिल कर ली। अच्छी बात यह रही कि इस काम से जुड़े किसानों को ही फायदा नहीं हुआ, बल्कि उपभोक्ताओं को भी उत्पादों की शुद्धता का लाभ मिला। मैंने रूट्स टू ग्रेन्स नाम से एक अभियान भी चलाया, जिसका मकसद लोगों को यह समझाना था कि वे अपने घरों के पीछे की जमीन पर कुछ न कुछ उगा सकते हैं।
मेरे पूरे कार्यक्रम की एक और खासियत है। हम अपने काम में प्लास्टिक का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं करते। हमारी संस्था के सभी सदस्य अपने उत्पादों को हस्तनिर्मित टोकरियों, झोलों या लिफाफों में रखकर क्रेता तक पहुंचाते हैं। इस पहल के पीछे हमारा मकसद लोगों को प्लास्टिक के विभिन्न विकल्पों के बारे में शिक्षित करना है, जो पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। हमारी पहल के कारण यदि एक व्यक्ति भी किराने की दुकान पर प्लास्टिक की थैली नहीं मांगता है, तो यह देखकर मुझे संतुष्टि मिलती है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।