कुछ समय बाद उन परिवारों से मेरा विशेष जुड़ाव हो गया। एक रात उन्हीं परिवारों में से एक महिला के छोटे बेटे ने मुझे फोन किया। उसने लगभग रोते हुए मुझे बताया कि उसकी मां के शरीर से खून बह रहा है और उसे अस्पताल ले जाना है। उस बच्चे ने मुझसे तुरंत आने का आग्रह किया। मैं वहां गई और उस महिला को अस्पताल ले गई, जहां डॉक्टर ने हमें बताया कि उसे मासिक धर्म से जुड़ी पुरानी समस्या है, लेकिन उसने कभी इसकी फिक्र नहीं की।
उस रात मुझे एहसास हुआ कि मैं कुछ तो कर सकती हूं। कुछ ऐसा, जिससे इन महिलाओं की जिंदगी में बदलाव आए। मैंने बहुत बड़ी शुरुआत नहीं की, बल्कि इन महिलाओं को सिर्फ मासिक धर्म स्वच्छता के बारे में जागरूक करने लगी। धीरे-धीरे महिलाओं को मेरी बात समझ में आने लगीं और हमारी बातचीत में दूसरी महिलाएं भी जुड़ने लगीं। अपनी बातों का प्रभाव देख मैं गद्गद थी। चंद दिनों में ही मैंने एक फाउंडेशन बनाने का निर्णय लिया।
मेरा निर्णय बिल्कुल सही निकला और अन्य लोगों की मदद से बहुत शीघ्र ही हमने उन जरूरतमंद परिवारों के लिए अनेक काम करने शुरू कर दिए। मगर हमारा मुख्य लक्ष्य महिलाओं के लिए शौचालय और सैनेटरी पैड मुहैया कराना रहा, क्योंकि इन्हीं दो जरूरतों को मैंने बहुत करीब से महसूस किया था। अपनी संस्था, मायना महिला के जरिये फंड इकट्ठा करके मैंने कई शौचालय बनवाए। फिर मैंने एक ऐसी व्यवस्था की, जिससे उन औरतों को कम से कम दामों में सैनेटरी पैड मुहैया हो सके। हमने इस लक्ष्य को भी हासिल किया। आज हमारी संस्था इस स्तर पर पहुंच चुकी है कि इसने पचास महिलाओं को रोजगार भी दिया है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।