उस दिन के बाद मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। बच्चों की सेवा को जीवन का मकसद बनाते हुए अपने का काम को मैं पूरे मनोयोग से से करती रही। सच कहूं, तो इतने शानदार काम के लिए मुझे ईश्वर का धन्यवाद करना चाहिए।
तब से लेकर अब तक मैंने कुल तैंतीस बच्चों को पाल-पोसकर बड़ा किया है। यह संख्या किसी भी बड़े से बड़े परिवार से बड़ी है। और सबसे खास बात यह कि बावजूद इसके मुझे प्रत्येक बच्चे से जुड़ी सारी चीजें याद हैं। मसलन, उन्हें क्या पसंद है, वे क्या करना चाहते हैं, सब कुछ। जैसे एक मां को अपने बच्चों के बारे में पता होता है। फिलहाल मेरे साथ केवल दस बच्चे ही बचे हैं, क्योंकि उनमें से कुछ बच्चे उच्च शिक्षा के लिए छात्रावास वगैरह में रह रहे हैं और बाकी पंद्रह अपने जीवन में सुनियोजित हो चुके हैं। इन पंद्रह में कुछ लड़कियां और लड़कों ने शादी भी कर ली है।
बेघर बच्चों की मां बनने की प्रकिया में मुझे हालांकि कई चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा। कुछ बच्चों को अपने परिवार में शामिल कर उनके साथा बाकियों का तालमेल बिठाने में बहुत मशक्कत करनी पड़ी। दो-चार सदस्यों के परिवार में भी मतभेद सामान्य है, मझे तो तैंतीस बच्चों को संभालना था। यह सब संभव हो सका संस्था द्वारा आयोजित किए जाने वाले विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रम और अपनी मजबूत इच्छाशक्ति के बदौलत। मुझे विदेश जाकर दुनिया भर में काम करने वाली मेरी जैसी दूसरी मांओं से मिलने का भी मौका मिला। मेरे लिए यह बहुत बड़ी बात थी, पर दर्जनों बच्चों की मां बनने से बड़ी नहीं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।