मैंने यह विचार अपने पापा से साझा किया, जो कि खुद एक बड़ी लॉजिस्टिक्स कंपनी में अच्छे पद पर कार्यरत हैं। आठवीं कक्षा में पढ़ने वाले तेरह साल के अपने बेटे की किसी दिमागी खुराफात पर एक बार में तो उन्होंने कोई खास ध्यान नहीं दिया। लेकिन कुछ समय बाद जब मैंने उन्हें इस काम के लिए किए गए अपने शोध और पूरी योजना बताई, तो वह मेरी मदद करने के लिए तैयार हो गए। मैंने एक बैंक अधिकारी से भी अपनी योजना साझा की। उन्हें मेरी बातें इतनी पसंद आईं कि उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी और मेरे साथ योजना को मूर्त रूप देने में जुट गए। जल्द ही 'पेपर एंड पार्सल' नाम से हमारा मोबाइल ऐप तैयार हो गया।
इसी ऐप की मदद से हम लोगों के कागज-पत्र आदि डब्बावालों के माध्यम से विभिन्न पतों पर पहुंचाने वाले थे। चार महीनों तक हमने ट्रायल के तौर पर इस सेवा को जांचा-परखा। सब कुछ ठीक मिलने पर पिछले दिनों मैंने इस सेवा की आधिकारिक शुरुआत कर दी। मैंने तीन सौ से ज्यादा डिब्बावालों को अपने नेटवर्क से जोड़ा है। फिलहाल हमें हर रोज हजार से ज्यादा डिलीवरी ऑर्डर मिल रहे हैं।
डिब्बेवालों को खाना पहुंचाने के अपने मूल काम में कोई दिक्कत न आए, इसके लिए मैंने पार्सल का अधिकतम भार तीन किलो तय किया है। डिब्बावालों के नेटवर्क का इस्तेमाल करके हम बेहद कम कीमत पर अपने आप में विश्वस्तरीय लॉजिस्टिक्स सेवा प्रदान कर रहे हैं। मेरी सेवाएं लेने वालों में ज्यादातर लोग पैथोलॉजी लैब, बुटीक और ब्रोकरेज कंपनी वाले होते हैं। भले ही मैं अभी बहुत छोटा हूं, पर मेरा लक्ष्य अगले दो वर्षों में कंपनी को नई ऊंचाई पर ले जाना है। मुझे सूरत के एक विश्वविद्यालय से बुलावा आया है। पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि वहां के बिजनेस स्टूडेंट्स को अपनी कहानी सुनाने के लिए।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।