मेरा जन्म उत्तराखंड के उधमसिंहनगर जिले के काशीपुर में हुआ था। मेरे पिता यहां के एक सरकारी महकमे में नौकरी करते थे। मेरा परिवार शुरू से ही मेरे अच्छे भविष्य के लिए प्रतिबद्ध था। भले ही अब तक कई मुस्लिम परिवार अपनी बेटियों को उच्च शिक्षा नहीं दिलाते, पर मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ। मैंने 1999 में काशीपुर से बीए की पढ़ाई पूरी की। मेरी जॉब करने की इच्छा तो थी, पर मेरी बढ़ती उम्र और रिश्तेदारों के दबाव तथा उनके बताए अच्छे रिश्ते के लालच में मेरी शादी इलाहाबाद के एक टैक्सी एजेंसी चलाने वाले शख्स से कर दी गई।
ससुराल ने दिए कई दर्द
शादी से पहले हमारे परिवार से ससुराल पक्ष की बहुत-सी बातें छिपाई गईं। मायके से ससुराल की दूरी भी बहुत ज्यादा थी। पहले दिन से ही ससुराल वालों ने मुझे सताना शुरू कर दिया था। यह व्यवहार आम भारतीय समाज में बहुओं के प्रति किए जाने वाले दुर्व्यहार की सीमा से कई गुना बुरा था। कभी दहेज को लेकर, तो कभी छोटी-छोटी बातों पर मुझे परेशान किया जाने लगा। इस बीच, मेरी तबीयत लगातार खराब रहने लगी। लेकिन मजाल है कि ससुराल वाले मेरी थोड़ी-सी भी फिक्र करते। मैं हर बीतते दिन नई-नई बीमारियों की गिरफ्त में जा रही थी। हालत ज्यादा खराब होने पर मुझे किसी सस्ते डॉक्टर को दिखा दिया गया, वह भी सिर्फ एक बार। दोबारा खैरियत की कोई पूछ नहीं।
पति के दोस्तों ने भी साथ न दिया
पति के दबाव में एक के बाद एक कराए गए गर्भपात से मेरी हालत बिगड़ती चली गई। इलाज न होने के कारण मैं सामान्य घरेलू काम तक नहीं कर पा रही थी। मेरी किडनी और लीवर में भी शिकायत आ गई। इसके बावजूद जब मैंने देखा कि मेरे पति पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा, तो मैंने उनके दोस्तों को अपनी पीड़ा बताई। बदकिस्मती से उन्होंने भी पति का ही साथ दिया। मैं बिल्कुल असहाय थी। दरअसल उनके असहयोग के पीछे सामाजिक मान्यताओं की जकड़न थी। उनके लिए भी कानूनी सुरक्षा नाम की कोई चीज नहीं थी।