असम में बहने वाली ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे स्थित एक गांव में मेरा जन्म हुआ था। मेरे पिता सेना में थे और मेरा बचपन अधिकांश अकेले ही बीता है। शायद यही कारण है कि प्रकृति से मेरी दोस्ती बहुत जल्द ही हो गई थी। बचपन के कुछ दृश्य मुझे अच्छी तरह याद हैं।
आसमान में राजा की तरह उड़ने वाले गिद्धों और सरसों के खेतों में जानवरों की लाशों को खाते हुए देखना मैं कैसे भूल सकती हूं! हालांकि मेरी दादी उन पक्षियों को स्थानीय नामों से पुकारती थीं। मैं उनके बारे में दादी से खूब सवाल करती। मुझे क्या किसी को उस वक्त अंदाजा नहीं था कि ये पूछताछ मेरे भविष्य का आधार है और मैं आगे चलकर उन पक्षियों के लिए ही कुछ करूंगी।
जीव विज्ञान में मेरी दिलचस्पी बढ़ती गई। मैंने इसी विषय में पढ़ाई जारी रखी। जब मैं परास्नातक में थी, तब मैंने प्रकृति को अपने ज्ञान के आधार पर कुछ वापस करने का फैसला किया। आज की तरह उस समय भी जीवों की कई प्रजातियों के विलुप्त होने के खतरे से जुड़ी खबरें सामान्य थीं। मैंने गुवाहाटी के बगल के जिले कामरूप के दादरा और पचरिया गांवों में विलुप्त हो रही जीव प्रजातियों के हक में काम करना शुरू किया। काम के सिलसिले में मैंने कई सर्वेक्षण किए।
मैंने पाया कि कई दुर्लभ चिड़ियों की प्रजातियां इसलिए खतरे में हैं, क्योंकि जिन पेड़ों पर उनके घोसले होते हैं, उन्हें काटे जाने के कारण अंडे समेत घोसले नष्ट हो जाते हैं। साथ ही पेड़ों की सूखी लकड़ियां टूटकर गिरते हुए घोसलों को नुकसान पहुंचाती हैं, जिसके लिए मैंने पेड़ों पर मौजूद घोसलों की सुरक्षा के लिए उनके नीचे एक जाल लगाना शुरू किया।
Conservationist Purnima Barman
वाइल्ड लाइफ कंजर्वेशन के लिए काम करने वाले गुवाहाटी के एक एनजीओ आर्यनक और क्षेत्रीय लोगों के साथ मिलकर मैंने ऐसे कई जाल लगाए। पक्षियों को बचाने का काम मैंने पेड़ों के साथ अपनी निजी जमीन पर भी जारी रखा। लेकिन इस पूरी कवायद से मेरे लिए ज्यादा जरूरी था लोगों और अपनी संस्कृति के लिए समर्पण। कई त्योहारी मौकों पर असम के लोग पक्षियों की पूजा करते हैं और उनका ही अस्तित्व खतरे में था।
बावजूद इसके मेरे लिए यह काम इतना आसान नहीं रहा। मैं दस हजार से ज्यादा आबादी वाले इलाके में काम कर रही थी। सबको अपने साथ लेकर चल पाना बहुत मुश्किल काम रहा। काम भी ऐसा था कि बिना जनभागीदारी के नहीं हो सकता। कई मर्तबा कुछ असामाजिक तत्वों ने हमारे पक्षी संरक्षण अभियान को प्रभावित करने की कोशिश की। मगर मेरे साथ की महिलाओं, बच्चों और दूसरे लोगों की ताकत हमेशा उन पर हावी रही।
महिलाओं को साथ लेकर मैंने एक टीम भी बनाई। मैंने अपना काम गर्व के साथ किया है। फिर चाहे पुलिस की मदद लेनी हो या अन्य संरक्षण प्रयासों से जुड़ने की बात हो, मेरा उत्साह हर जगह बरकरार रहा। मेरे पति खुद एक जीवविज्ञानी हैं और उन्होंने मेरे काम को हमेशा सराहा है। मैं दो बच्चों की मां भी हूं और साड़ी पहनकर भी पेड़ों के पास बांस के बने टावरों पर चढ़ने से पहले अपने पहनावे की परवाह नहीं करती।
एक अकेली महिला को पक्षियों की प्रजातियों के संरक्षण के लिए इस तरह काम करना कई लोगों को भद्दा भी लगता है। लेकिन यही मेरा जुनून है और अपने काम से मैं बहुत खुश हूं। मैं मानती हूं कि अपने लक्ष्य पर ध्यान बनाए रखा जाए, तो कोई भी चुनौती असंभव नहीं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।