पिछले छत्तीस वर्षों से मैंने अपना संकल्प जीवित रखा है और मैं इन्हीं बच्चों के लिए काम कर रही हूं। मेरे स्कूल में अब तक करीब दस हजार शारीरिक और दिमागी रूप से अशक्त बच्चे शिक्षा एवं रोजगार प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके हैं। मूक-बधिरों को सांकेतिक भाषा के जरिये शिक्षा दी जाती है।
मेरे स्कूल में बच्चों को सांस्कृतिक कार्यक्रमों से जोड़ने के साथ उन्हें शारीरिक खेलों से भी जोड़ा जाता है। यहां से निकलने वाले बच्चे देश की प्रगति में अपनी सक्रिय भागीदारी निभा रहे हैं। कुछ बच्चे सरकारी विभागों में भी तैनात हैं।
फैजाबाद की छावनी परिषद में काम करने वाला रामस्वरूप उन्हीं बच्चों में से एक है, जो एक मूक-मधिर अनाथ है। आज वह सरकारी नौकरी भी कर रहा है, साथ ही एक सामान्य लड़की से शादी करके अपनी जिंदगी खुशी-खुशी जी रहा है। मेरा हमेशा से यही मानना है कि इस धरती पर जन्म लेने वाली प्रत्येक आत्मा एक समान हकों की अधिकारी है। ऐसे में इन अशक्त बच्चों की सामाजिक उपेक्षा क्यों की जाती है, बल्कि इन्हें तो मुख्यधारा से जोड़ने के लिए विशेष प्यार की आवश्यकता है।
मैं अपने मुख्य काम के अलावा अनाथ बच्चे, पैदा होते ही फेंक दी गई बच्चियों के पुनर्वास, बुजुर्गों को सहारा देने और अपंगों को तिपहिया साइकिल आदि देने का कार्य भी कर रही हूं। इन सारे कामों के लिए मुझे लोगों की मदद मिलती रहती है।
शिक्षिका के तौर पर साढ़े तीन दशक की लंबी नाबाद पारी खेलकर मुझे अपने काम पर संतोष है। मेरी उम्र बासठ पार हो चली है, मगर मैंने अभी आराम करने के बारे में नहीं सोचा है। अपने अनुभवों के आधार पर भविष्य में मैं एक ऐसा आश्रयस्थल बनाना चाहती हूं, जहां अनाथ बच्चों के अलावा समाज से दुत्कारे गए हर शख्स को एक नया परिवार मिल सके।