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1 छात्र को पढ़ाने के लिए 50 किलोमीटर की दूरी तय करते हैं रजनीकांत

Wed, 18 Apr 2018 01:17 AM IST
रजनीकांत मेंढे
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Rajinikanth Mandhe
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महाराष्ट्र के पुणे शहर से करीब सौ किलोमीटर दूर इस चंदर गांव में सिर्फ पंद्रह घर हैं। इन घरों में रहने वाले बाशिंदे भी केवल साठ ही हैं। मतलब गांव में जितने इंसान नहीं रहते हैं, उससे ज्यादा यहां आपको सांप मिल जाएंगे। जहां देश के कई इलाकों में हजारों की आबादी के बीच एक भी स्कूल नहीं होता, वहीं इस गांव की अच्छी बात यह है कि यहां उंगलियों पर गिनी जा सकने वाली आबादी के लिए एक स्कूल है। और मैं इस स्कूल का अध्यापक हूं।

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सबसे खास बात यह है कि 1985 में बने इस स्कूल में मौजूदा वक्त में केवल एक छात्र ही पढ़ता है। इस गांव तक पहुंचने के लिए मुझे हर रोज हाईवे से लेकर ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी रास्ते पर करीब 50 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है।

ऐसा नहीं है कि इस स्कूल में हमेशा से छात्रों का टोटा रहा है। कुछ वर्ष पहले, जब मैंने यहां पढ़ाना शुरू किया था, तब यहां कुल ग्यारह बच्चे पढ़ने आते थे। वे बच्चे पढ़ने में ठीक थे, लेकिन उनके परिवार की गरीबी ने उन्हें किताबों से दूर कर दिया। कई बच्चों को तो खेतों और फैक्टरी में मजदूरी करने के लिए दूसरे राज्यों में भी भेज दिया गया। मैंने कई बार उन बच्चों के अभिभावकों से बच्चों को मजदूरी न करवाने और स्कूल में पढ़ाने की सिफारिश की, मगर इसका कोई फायदा नहीं हुआ। 

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कुछ छात्रों ने इसलिए भी स्कूल छोड़ दिया था कि गांव में प्राइमरी स्कूल के बाद आगे की पढ़ाई की कोई व्यवस्था नहीं थी। उन्हें पड़ोसी गांव का स्कूल बेहतर लगा। इस तरह से धीरे-धीरे मेरे छात्रों की संख्या घटती गई और स्कूल में युवराज नाम का एक मात्र बच्चा बचा।

केवल एक बच्चे को पढ़ाना थोड़ा अजीब तो था, लेकिन मैंने अपनी ड्यूटी से समझौता नहीं किया। एक बार तो युवराज को भी लगा कि मैं सिर्फ उसे पढ़ाने इतनी दूर से नहीं आऊंगा। लेकिन मैं बगैर किसी हर्जा के लगातार अपने इकलौते छात्र को पढ़ाने पहुंचता हूं। इस दौरान कई बार मेरा सामना सांपों से हुआ है। कभी स्कूल की छत में लटकते हुए, तो कभी सड़क पर रेंगते हुए सांपों ने मेरा हौसला तोड़ने की कोशिश की।

इन मुश्किलों के बावजूद मेरा प्रयास यह है कि मैं स्कूल में दूसरे छात्रों को ला सकूं। इसके लिए मैंने स्कूल के इकलौते कमरे में एक टीवी सेट लगाया है। हालांकि गांव में अब तक बिजली नहीं पहुंच सकी है, मगर सोलर पैनल के माध्यम से मैंने टीवी का प्रयोग करते हुए युवराज के लिए ई-लर्निंग का इंतजाम किया है। इसके अलावा मैंने अपने पैसों से टैबलेट कंप्यूटर खरीदकर स्कूल को आकर्षक बनाने का हर संभव प्रयास जारी रखा है।

मैं हर रोज जब इस गांव में पढ़ाने पहुंचता हूं, तो मेरा सबसे पहला काम अपने एक मात्र छात्र को ढूंढना होता है। बिना दोस्तों के पढ़ाई करना उसके लिए भी मुश्किल काम है। मैं अक्सर उसे पेड़ों के पीछे छिपा हुआ पाता हूं। मैं उसे हर रोज समझा-बुझाकर कुछ घंटों के लिए स्कूल में ले आता हूं, उसे पूरी मेहनत से पढ़ाता हूं। युवराज पर खास ध्यान देने की एक वजह यह भी है कि उसके दूसरे साथी स्कूल से बाहर खेतों में काम करते हुए या जानवरों को चराते हुए आपस में खेल रहे होते हैं, लेकिन उसके लिए तो सिर्फ मैं हूं। मैं ही उसका शिक्षक हूं और मैं ही उसका दोस्त!
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
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