पांच रुपये इसलिए, क्योंकि मैं यह मानता हूं कि मुफ्तखोरी गलत है। खाना इतना सस्ता हो कि कोई भी खा सके और किसी इंसान का स्वाभिमान भी प्रभावित न हो। मेरा प्रयोग चल निकला। इस विशेष रसोई की शुरुआत करते हुए मैंने नहीं सोचा था कि यह कब तक चलेगी। मगर दिन भर सैकड़ों भूखों को पेट भर खाना खाते देख मैंने तय कर लिया कि यह रसोई अब बंद नहीं होगी और खाने की कीमत भी पांच रुपये ही रहेगी।
आगे चलकर मैंने गरीबों के लिए मात्र दस रुपये में कपड़े की भी व्यवस्था की। ये कपड़े मुझे लोगों द्वारा दान में मिलते हैं। मैं दान में मिले कपड़ों को बाकायदा ड्राई क्लीन कराकर पैक करके जरूरतमंदों को दस रुपये में मुहैया कराता हूं। इसके साथ हाल ही में मैंने नोएडा के एक दूसरे इलाके में प्रधानमंत्री जन औषधि योजना के अंतर्गत एक दवाखाने की स्थापना की है, जहां महंगी से महंगी दवाएं एक-दो रुपये में खरीदी जा सकती हैं।
इस तरह मैं गरीबों के लिए रोटी, कपड़ा और दवा जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए काम कर रहा हूं। अपने काम के लिए मुझे कभी भी आर्थिक परेशानी नहीं हुई। क्योंकि तमाम तरह की नकारात्मकता वाले समाज में ऐसे बहुत लोग हैं, जो कुछ न कुछ देना चाहते हैं। उन्हें तो बस सच्चे भरोसे की तलाश है। मैं मानता हूं कि आप कितने भी धनी व्यक्ति क्यों न हों, अगर आपके साथ किसी जरूरतमंद की दुआएं नहीं हैं, तो आप बहुत गरीब हैं। देश के दूसरे हिस्सों में भी कई अन्य लोगों ने भी काम का अनुसरण किया है।