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बेटा खोने के गम में बना मददगार जासूस, 9 साल में 150 मामलों में मिली कामयाबी

Tue, 10 Apr 2018 01:20 AM IST
सूर्यकांत
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suryakant
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कई वर्ष पहले की बात है। नए घर में रंग-रोगन का कुछ काम अभी बाकी था, लेकिन मैं परिवार के साथ महाराष्ट्र के सतारा स्थित अपने नए घर में रहने के लिए आ चुका था। अपने तीन साल के बेटे संकेत को उसके प्री-स्कूल में भेजने के बाद उस दिन मैं अपनी इंजीनियरिंग साइट पर व्यस्त था और मेरी पत्नी नए घर में सामान व्यवस्थित करने में जुटी थी। मेरी पत्नी यह काम जिला परिषद के एक सरकारी स्कूल में शिक्षण के अपने पेशे के साथ किसी तरह संभाल रही थी।

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हम सभी अपने नए आशियाने को लेकर बहुत उत्साहित थे। होते भी क्यों नहीं, शहर की घनी आबादी से दूर यह कितना प्यारा बंगला था और यहां शाम को संकेत के खेलने के लिए खासी जगह भी थी। दोपहर के बारह बजे थे, यह वक्त था संकेत के स्कूल से घर वापस आने का। उस दिन कुछ देरी हुई, तो हम दोनों पति-पत्नी ने एक-दूसरे को फोन करके बच्चे के बारे में जानकारी ली। जब हम दोनों को यह मालूम हुआ कि किसी को बेटे की खबर नहीं है, तब हमें चिंता हुई।

थोड़ी ही देर हुई कि करीब दो बजे घर के लैंडलाइन पर किसी अजनबी का फोन आया। हमें उस तरफ से बताया गया कि संकेत का अपहरण कर लिया गया है और वह हमें एक लाख रुपये के बदले मिलेगा। एक बार तो हमें इस पर विश्वास ही नहीं हुआ। लेकिन जल्द ही हमें घटना की सच्चाई का एहसास हो गया। बेटे के लिए मैं कोई भी कीमत अदा करने को तैयार था। लेकिन मुझे यह भी अंदाजा था कि अपहरणकर्ताओं की बात एकदम से मान लेने पर इसकी क्या गारंटी है कि कल को कोई दूसरी मांग नहीं करेंगे या किसी दूसरे बच्चे के साथ ऐसा नहीं करेंगे! इसलिए जरूरी था कि अपने बच्चे को सकुशल वापस पाने के साथ उन बदमाशों को भी कानून के हवाले किया जाए।

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इंसानी भेष में उस शैतान ने मेरे बच्चे की जान ले ली थी

मैंने रुपयों से भरा बैग अपहरणकर्ताओं के बताए स्थान पर पहुंचा दिया। मुख्य सड़क से वह जगह कुछ ही दूरी पर थी। बमुश्किल दो-तीन मिनट बाद हम दोबारा वहां पहुंचे, तो बैग गायब था। पुलिस की सारी योजना धरी की धरी रह गई और अपहरणकर्ता भागने में कामयाब रहा। जिसका डर था, वही हुआ, पैसे देने के बावजूद मेरा बेटा मुझे वापस नहीं मिला।
डेढ़ महीने बीते थे कि अपहरणकर्ता ने दूसरी मांग रखी। इस बार मैंने पुलिस के साथ मिलकर अपहरणकर्ता को दबोच लिया। अपहरणकर्ता लकड़ी का काम करने वाला एक कारीगर निकला, जो मेरे दफ्तर में भी काम कर चुका था। लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। इंसानी भेष में उस शैतान ने मेरे बच्चे की जान ले ली थी।

मैं चाहता था कि जो मेरे साथ हुआ, वह किसी भी परिवार के साथ न हो। इसके लिए मैंने एक प्राइवेट डिटेक्टिव एजेंसी खोली, जो मेरे जैसे पीड़ित परिवारों की निःशुल्क मदद करती है। मेरे पास कोई प्रशिक्षित जासूस नहीं है, लेकिन मैं इस बात में यकीन करता हूं कि परिवार के सदस्यों की जानकारी के आधार पर काफी कुछ किया जा सकता है और मैंने ऐसा किया भी है। हालांकि हर बार लोग मेरी मदद लेने को तैयार नहीं होते, उन्हें मेरे काम पर शक भी होता है। फिर भी कई तरह के जोखिम उठाते हुए मैंने पिछले नौ साल में डेढ़ सौ मामलों में अनेक परिवारों को वह खुशी दी है, जो कभी मुझसे छिन गई थी।

-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
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