उनसे बात करने पर मुझे पता चला कि वे सभी शोर से परेशान हैं और बदलाव चाहते हैं, लेकिन वे इसलिए चुप हैं, क्योंकि इस शोर के पीछे बहुत प्रभावशाली लोग होते हैं। और धर्म आदि के मामले में कौन टांग अड़ाए! मुझे समझ में आ गया कि बिना जोखिम लिए कोई बदलाव नहीं आ सकता, और उसके लिए भी जरूरी है कि सरकार द्वारा बनाए गए कानूनी प्रावधानों पर अमल हो। जनहित याचिका का सही प्रयोग करना मुझे आता था। 2009 में उच्च न्यायालय ने मेरी ऐसी ही एक याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को ध्वनि प्रदूषण को लेकर कड़े निर्देश दिए।
हमारी संस्था के काम का असर दिखने लगा था। दरअसल आवाज पहली ऐसी संस्था थी, जिसने भारत में ध्वनि प्रदूषण को लेकर डाटा इकट्ठा किया था। तब से लेकर आज तक मैं अदालत के अलावा अनेक रचनात्मक तरीकों से लोगों को ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ जागरूक करती रहती हूं। कई लोग मुझे यह समझते हैं कि मैं उत्सवों के रंग में भंग डालने वाली कार्यकर्ता हूं। कुछ लोग मेरे काम में धार्मिक कोण भी निकाल लेते हैं, मगर मुझे अपना काम पता है।
मैं जानती हूं कि त्योहार खुशियों के लिए होते हैं और शोर-शराबा स्वास्थ्य के लिए घातक बीमारी है, जिसका उत्सव से कोई लेना-देना नहीं। मैं इसी बीमारी को मिटाने में जुटी हूं। लोगों को जागरूक करने के लिए मैं मुंबई की सड़कों पर एक विशेष ऑटोरिक्शा संचालित कराती हूं, जिसकी बॉडी पर सैकड़ों हॉर्न लगाए गए हैं। ये हॉर्न लोगों का ध्यान इस तरफ ले जाते हैं कि सड़कों पर हॉर्न का किस तरह बेजा इस्तेमाल किया जाता है। इस ऑटो पर 'हॉर्न नॉट ओके प्लीज' लिखा है। साथ ही मैंने रेत खनन माफियाओं के विरुद्ध भी अपनी मुहिम छेड़ रखी है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।