इन्हीं घटनाओं को ध्यान में रखते हुए मैंने इसी विषय पर अपनी रिपोर्ट तैयार करने का फैसला किया। जब मैंने किशोरों में नशे की लत के बारे में शोध कार्य करके इसकी रूपरेखा अपने पिता से साझा की, तो वह इस विषय चयन से काफी प्रभावित हुए। उन्होंने मुझे इस रिपोर्ट को किताब की शक्ल देने का सुझाव दिया। मेरे परिवार के सदस्यों द्वारा पहले भी किताबें लिखी जा चुकी थीं, सो इस काम के लिए जरूरी आत्मविश्वास के लिए मुझे भटकना नहीं पड़ा।
फिर भी पंद्रह साल की उम्र में किताब लिखना मेरे लिए बहुत आसान नहीं था। मैंने हर चीज पर काम किया, जैसे छोटे बच्चों को सिगरेट मिलती कहां से है आदि। छह महीनों के भीतर मैंने अपनी किताब द बर्निंग ट्रुथ पूरी कर ली। उपन्यास की शक्ल में इस किताब में किशोरों में पनपने वाली धूम्रपान की लत का पूरा ब्योरा है, जिसमें कई मनोचिकित्सकों के साक्षात्कार भी शामिल हैं। किताब छपने के बाद सैकड़ों प्रतियां स्कूल के स्टॉल पर चंद घंटों में बिक गई। किताब की बिक्री से हुई कमाई को मैंने मुंबई आधारित एक एनजीओ को दान कर दिया।
मेरे कई जूनियरों ने किताब पर काम करने के लिए मुझसे सलाह ली है। मुझे उनकी मदद करके बेहद संतुष्टि हासिल हुई। मुझे कई छात्र हाथ में मेरी किताब लिए दिख जाते हैं। मगर मैं उस दिन के इंतजार में हूं, जब कोई आकर मुझसे बोले कि आपकी किताब ने मुझे धूम्रपान छोड़ने के लिए विवश कर दिया।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।