तीन साल पहले सड़क के एक गड्ढे ने मेरे सोलह वर्षीय बेटे प्रकाश की जान ले ली थी। उसने दसवीं की परीक्षा पास कर ली थी और आगे की पढ़ाई के लिए एक कॉलेज में प्रवेश फॉर्म जमा करके अपन बड़े भाई राम के साथ मोटरसाइकिल से घर लौट रहा था। जुलाई का महीना था, सो रास्ते में तेज बारिश की वजह से उन्हें पोवाई इलाके में एक ठिकाने पर रुकना पड़ा। बारिश धीमी हुई, तो वे वहां से घर की ओर चले। जब वे जोगेश्वरी-विखरोली लिंक रोड के पास पहुंचे, तो उन्हें आगे की सड़क पूरी तरह जलमग्न मिली।
सड़क पर भरे पानी की गहराई का अंदाजा लगाकर वे चलते रहे। अचानक पानी से लबालब सड़क पर उनकी मोटरसाइकिल कब एक जानलेवा गड्ढे में समा गई, उन्हें पता ही नहीं चला। जब तक वे कुछ समझ पाते, दोनों भाई उछलकर इधर-उधर जा गिरे। चूंकि राम मोटरसाइकिल चला रहा था, जिस कारण गड्ढे का अंदाजा उसे पहले हुआ और वह दुर्घटना से बचने को थोड़ा-सा सतर्क था। मगर उसके पास इतना वक्त नहीं था कि वह प्रकाश को आगाह कर पाता। आसपास के लोग भी बेबसी के साथ बस मुंह खोलकर देखते रह गए। थोड़ी देर बाद दोनों जख्मी भाइयों को अस्पताल ले जाया गया।
जब यह दुर्घटना मुंबई के एक छोर में घट रही थी, मैं उस वक्त अंधेरी इलाके में ग्राहकों को सब्जी बेच रहा था। मुझे किसी का फोन आया और उसने मुझे बताया कि आपका बेटा बाइक से गिर गया है। मुझे लगा कि हल्की-फुल्की चोटें आई होंगी और यह बहुत चिंता की बात नहीं है। मैं निश्चिंत था। थोड़ी देर में मुझे दोबारा किसी ने फोन किया कि प्रकाश के सिर में गंभीर चोटें आईं हैं, जबकि राम ठीक है। मेरी आंखों के सामने अचानक अंधेरा छाने लगा। और यह अंधेरा चंद मिनटों में प्रकाश की मौत की खबर के साथ और गाढ़ा हो गया। मैं अपने बेटे प्रकाश को असमय मौत से नहीं बचा सका।
लेकिन मैंने फैसला किया सड़क के गड्ढों की वजह से किसी दूसरे के साथ ऐसा न हो। बेटे की मौत हुए महीने भर नहीं बीते थे कि मैं बजरी, पत्थर और ईंट के टुकड़े लेकर सड़कों के गड्ढे भरने निकल पड़ा। आस-पड़ोस के लोगों को लगा कि बेटे की मौत के सदमें में मैं पागल हो गया हूं। मैं प्रकाश को अच्छी तरह से जानता था। वह बहुत अच्छा, लायक और चुस्त लड़का था, जिसकी रग-रग में भरपूर जीवन जीने की तमन्ना थी।
मेरा बेटा कभी यह न चाहता कि ऐसा हादसा किसी के साथ भी हो। मैं उसकी मौत के लिए जिम्मेदार लोगों को सजा दिलाने के लिए तो अपना संघर्ष जारी रखे हुए हूं, लेकिन इसी बीच मैं यह नहीं चाहता कि कोई अन्य इस प्रकार के हादसे का शिकार हो, इसलिए मैं सड़कों और गलियों को सुरक्षित बनाने के प्रयास में जुटा हूं। मैं पिछले तीन वर्षों में 554 गड्ढों को भर चुका हूं। प्यार से लोग मुझे 'पॉटहोल दादा' के नाम से पुकारने लगे हैं। यदि किसी गड्ढे की शिकायत संबंधित आधिकारियों से की जाए, तो कम से कम बीस दिनों में उसका संज्ञान लिया जाता है।
मुझे पता है कि न्याय अपने आप नहीं मिलता, बल्कि उसे हासिल किया जाता है। इसलिए मैंने अपने बेटे की मौत के जिम्मेदार लोगों के खिलाफ मुकदमा भी दायर किया है। मेरे प्रयासों के बाद कई अन्य पीड़ितों ने भी व्यवस्था की इस खामी के खिलाफ आवाज उठाई है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।