मैंने तत्काल जरूरी कदम उठाते हुए प्रशासनिक अधिकारियों की मदद से वह शादी रुकवाई। जब लड़की के परिवार ने अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों की दुहाई दी, तो मैंने उसकी पढ़ाई का खर्च उठाने की पेशकश की और उसे छात्रावास में भर्ती कर लिया। बेहद कम अंतराल के बीच घटी इन दो घटनाओं ने मेरी सोच को काफी हद तक प्रभावित किया।
अब मैं ढूंढ-ढूंढकर ऐसे बच्चों की मदद करने लगा, जिन्हें वास्तव में मेरी जरूरत थी। ऐसा ही एक और बच्चा था, जिसने अपने परिवार की गरीबी के कारण स्कूल आना छोड़ दिया था और अपने पिता के साथ खेतों में मजदूरी करता था। मैं उसे वापस स्कूल ले आया और इसकी व्यवस्था की कि उसे कभी दोबारा स्कूल न छोड़ना पड़े।
अभी कुछ दिनों पहले की ही बात है, मैंने पंद्रह साल की एक बच्ची अपने स्कूल के हॉस्टल में जगह दी है। मथुरापुर की इस बच्ची की पचास साल के एक कश्मीरी व्यक्ति के साथ जबर्दस्ती शादी कर दी गई थी। जब किसी तरह कश्मीर घाटी से निकलकर यह बच्ची वापस अपने घर पहुंची, तो इसके घरवालों ने इसे पहचानने से ही इन्कार कर दिया। यह बच्ची भी पहले मेरे स्कूल में पढ़ती थी। जब वह अपना दुखड़ा लेकर मेरे पास आई, तो मैंने उसे पनाह तो दी ही, साथ ही उसकी हरसंभव न्यायिक मदद का भी इंतजाम किया है। चुपचाप अपने काम से मतलब रखने पर भी मुझे इज्जत मिलेगी, लेकिन मैं समाज की तमाम गड़बड़ियों में अड़ंगा डालकर कई तरह के जोखिम उठाता हूं। क्योंकि मुझे पता है कि बच्चों का भविष्य केवल किताबों से ही बनेगा।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।