पानी की उपलब्धता लगातार कम होती जा रही थी, जिसको रोकना बेहद जरूरी हो रहा था। मैंने तालाब पक्के करने का बीड़ा उठाया। हर हाल में पानी मिट्टी से दूर रहे, इसके भरसक प्रयास किए। कम पानी से सिंचाई हो सके, इसके लिए किसानों से खेती के लिए डीप इरिगेशन तकनीक का प्रयोग कराना शुरू किया। धीरे-धीरे ही सही, पर जैसे-जैसे किसानों में जागरूकता आती गई, उन्होंने तकनीक इस्तेमाल करके खेती शुरू की।
मेरे प्रयासों का नतीजा यह निकला कि आज कड़बनवाड़ी के लगभग सभी किसान खुशहाली के साथ अनार और गन्ना जैसी नकदी फसलों की खेती उन्न्त तरीके से कर रहे हैं। जिस इलाके में कभी पानी की कमी के कारण खेती बदहाल एवं घाटे का सौदा बन गई थी, आज वही गांव दूसरे लोगों के लिए नजीर बन गया है।
मृदा और जल संरक्षण के प्रयासों को अंजाम तक पहुंचाने के बाद मेरा अगला प्रयास गांव के पास फैले करीब पांच सौ हेक्टेयर में फैले जंगल के संरक्षण से जुड़ा है। इन जंगलों में रहने वाले चिंकारा को शिकारियों से बचाना भी मेरी योजना का हिस्सा है।
मेरे अब तक के पूरे सफर का एकमात्र मकसद यही है कि गांव के लोग गांव में ही रहकर गांव की समस्याएं खत्म करने की दिशा में काम करें। विकास का गांधी मॉडल यही है। अब कोई भी कड़बनवाड़ी वासी गांव से बाहर रोजगार के लिए नहीं जाता और न ही बच्चों को पढ़ाई छोड़कर घर वालों की मदद करनी पड़ती है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।