अखबार बेचने जैसे काम करने के बाद आज मैं कोच्चि की सड़कों पर ऑटोरिक्शा चलाता हूं। सड़कों पर घूमने वाले बिना किसी पहचान के बेघर, अनाथ बच्चों की जिंदगी संवारने के एक मात्र उद्देश्य से वर्ष 2007 में मैंने अपनी संस्था थेरुवोरम की स्थापना की थी।
मेरे काम में मेरी पत्नी ने मेरा पूरा साथ दिया है, जो एमबीए डिग्री धारक है। उसने अपनी अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर नेक इरादों के साथ मेरा हाथ थामकर मेरी जीवन संगिनी बनने का फैसला किया था।
दया व करुणा की मूर्ति मदर टेरेसा मेरी प्रेरणा और आदर्श हैं। पिछले अट्ठारह वर्षों से मैं अब तक राज्य और शहर के अलग-अलग कोने से कई हजार बच्चों को उनकी पुरानी जिंदगी से निकालकर एक बेहतर जीवन देने की कोशिश कर रहा हूं। दुनिया में ऐसे अनेक लोग हैं, जो गरीबी खत्म करने के लिए पर्याप्त समृद्ध हैं, लेकिन कम ही लोग इस दिशा में कुछ सोचते हैं।
मैं मानता हूं कि अगर किसी अच्छे काम के लिए अपने धन का इस्तेमाल ही न किया जाए, तो धन प्राप्त करने का क्या मतलब है? मेरा लक्ष्य बेसहारा बच्चों को न सिर्फ एक आश्रय प्रदान करना है, बल्कि मैं समाज में बदलाव लाने की भी ख्वाहिश रखता हूं, और जब तक मैं इसे प्राप्त नहीं करूंगा, तब तक नहीं रुकूंगा।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।