यों समझिए कि कंप्यूटर की दुनिया में रहने वाला शख्स कुदरती दुनिया के करीब आ रहा था। मैं चिड़ियों के प्रेम में ऐसे पड़ी कि भौतिक दुनिया मुझे छोटी लगने लगी। यह मेरे प्रेम का विस्तार ही था कि मैंने अपने घर में सौ से ज्यादा बर्ड शेल्टर बॉक्स लगा डाले।
पक्षियों के लिए काम करने वाले विभिन्न एनजीओ के लिए स्वयंसेवक के तौर पर काम करना शुरू किया। मगर उन एनजीओ के लिए काम करते हुए मैंने देखा कि वे संगठन किस तरह पर्यावरण प्रेमियों की भावनाओं को अपने व्यापार में बदल देते हैं। मसलन, यदि किसी को बर्ड शेल्टर बॉक्स चाहिए, तो उन्हें वे काफी महंगे दामों में उपलब्ध कराते हैं।
मुझे यह देखकर खराब लगा। इसके बाद मैंने कई किताबें पढ़ी, पर्यावरणविदों से मिली और जाना कि कितने कम पैसे में बर्ड शेल्टर बॉक्स बनाए जा सकते हैं। तीन साल पहले मैंने अपनी संस्था अरेण्या की स्थापना की, जिसके मदद से बिना मुनाफा लिए लोगों तक सस्ते शेल्टर बॉक्स पहुंचाने लगी। इस काम से लोगों में जागरूकता आने लगी।
मेरे काम की चर्चा हुई, तो मुझे तमाम स्कूलों में पारिस्थितिकी विषय पर बोलने के लिए बुलाया जाने लगा। एक वक्त ऐसा आया कि मैं हफ्ते के अलग-अलग दिनों में विभिन्न स्कूलों में नियमित रूप से जाने लगी। तीन महीने पहले घर के ऋण की किस्तों की जिम्मेदारी से निवृत्त होने के बाद मैंने इंजीनियरिंग की नौकरी भी छोड़ दी। क्योंकि अब मुझे ज्यादा पैसों की नहीं, बल्कि पक्षियों की चिंता अधिक है और इसी काम में मुझे संतुष्टि मिलती है।