नारी सुधार गृह से निकलने के बाद मेरे सामने अस्तित्व का संकट था, क्योंकि मेरे पिता बूढ़े हो चले थे और वह गांव में ही रहते थे। थक-हार कर मैंने एक दुकान पर काम करने का फैसला किया। मुझ पर अपने बेटे के खर्च का भी बोझ था। मेरा बेटा अपनी दादी के साथ असम में रहता था, लेकिन बीच-बीच में मैं उसे देवरिया भी ले आती थी। बेटा बड़ा हो रहा था, जिससे बड़ी हो रही थीं उसकी जरूरतें। मैं जो कमाती थी, वह इतना नहीं था, जिससे खर्च चल सके।
नतीजतन मैं आमदनी बढ़ाने का प्रयास करने लगी। इसी कोशिश में मैंने अपने एक परिचित भैया से बात की। वह अखबार बांटने का काम करते थे। मैंने उनके सामने अखबार बांटने का काम करने का प्रस्ताव रखा। यह ऐसा काम था, जिससे मेरा दिन का काम प्रभावित नहीं होता। उन भैया की मदद से मेरे हॉकर बनने की सारी व्यवस्था हो गई। काम के पहले दिन सुबह चार बजे उठ कर अखबार की गड्डियों के साथ साइकिल से जब मैं निकली, तो मन में एक अजीब तरह की झिझक थी। मैं वह काम करने जा रही थी, जिसे लड़कियां नहीं करतीं। वर्षों की परंपरा को एकदम से तोड़ने में मुझे कुछ दिक्कतें आईं, लेकिन मुझे पता था कि यह काम बुरा नहीं है।
कुछ लोगों ने मेरा उपहास बनाया, तो कुछ लोगों मेरे हिम्मत की दाद दी। मैं हर सुबह चार घंटों में करीब डेढ़ सौ घरों तक अखबार पहुंचाती हूं। इसके लिए मुझे दर्जनों किलोमीटर साइकिल चलानी पड़ती है। उसके बाद पूरे दिन एक कपड़े की दुकान पर काम करती हूं। इस तरह से मेरी ड्यूटी सुबह चार बजे से रात आठ बजे तक चलती है। लेकिन सोलह घंटे का काम मैं खुशी-खुशी करती हूं, क्योंकि मैं अतिरिक्त कमाई से अपने बेटे को पढ़ा-लिखाकर अफसर बनाना चाहती हूं।