मैं यह दृश्य देखकर बहुत खुश हुई, मैंने सोचा क्यों न इस काम को आगे बढ़ाया जाए। अगले कुछ वर्षों तक जीवन की शुष्क दिनचर्या में खिलौनों की ओस ने नमी बनाए रखी। एक योजना के मुताबिक, मैंने 2009 में अपनी नौकरी छोड़कर एक खिलौना बैंक खोला। 'टॉय बैंक' नाम से हमारी संस्था को अच्छे स्वयंसेवकों और नेक दिल ट्रस्टियों का साथ मिला।
मैंने बहुत करीब से महसूस किया है कि खिलौनों का बच्चों के व्यवहार पर खासा असर पड़ता है और ये हर बच्चे की जरूरत होते हैं। मुझे अच्छी तरह याद है कि शुरू में मैंने एक बच्चे को खिलौना बंदूक दी, तो उसने बंदूक हाथ में लेकर कहा कि मैं बड़ा होकर गुंडा बनूंगा। उसकी बात का सकारात्मक पहलू यही था कि खिलौने ने उसके दिमाग पर तुरंत प्रभाव छोड़ा।
मैं मानती हूं कि मैं कोई चैरिटी या महान काम नहीं कर रही हूं। मैं तो एक माध्यम की मदद से उन बच्चों को उनका हक दिलाने की कोशिश करती हूं, जो कि गलत सामाजिक व्यवस्था ने उनसे छीन ली है। पिछले कई वर्षों में हमारे बैंक ने हजारों बच्चों तक खिलौने पहुंचाने का काम किया है। आज हमारा दायरा सिर्फ मुंबई में ही नहीं, बल्कि बंगलूरू, पुणे, दिल्ली जैसे दूसरे महानगरों तक फैल चुका है। कई लोग हैं, जो ऐसा ही काम करना चाहते हैं। मेरी उनको सलाह है कि जुनून पैदा करने के लिए पहले उन्हें एक स्वयंसेवक की तरह काम करना चाहिए।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।