नए रास्ते में एक पुल था। पुल के नीचे मैंने एक औरत को देखा, जिसके पैर कटे हुए थे और उसकी हालत बहुत बुरी थी। मैं उसके पास गया, तो पता चला वह भूखी भी है। मैंने होटल से खाना खरीदकर उसे खिलाया। उस दिन मैं दुकान तो चला गया, लेकिन उस महिला का भूखा चेहरा मुझे बार-बार याद आता। दरअसल बचपन में मेरा भी भूख से अनचाहा वास्ता पड़ा है।
मैं घर लौटा और पूरी कहानी पत्नी तथा मां को बताई। पत्नी ने मेरी बेचैनी पढ़ ली। मां तो मुझे देख खुश हो रही थीं, क्योंकि मेरी बेचैनी पर उनकी सीखों का असर दिख रहा था। अगले दिन जब मैं घर से बाहर निकलने लगा, तो मेरी पत्नी ने मुझे पंद्रह लोगों का खाना पकड़ा दिया और कहा कि इसे उस पुल के नीचे जरूरतमंदों में बांट देना।
मेरे काम की यह शुरुआत थी, जो आज तक बदस्तूर जारी है। पंद्रह लोगों का पेट भरने से शुरू हुआ यह सफर आज डेढ़ सौ लोगों तक पहुंच गया है। लेकिन ईमानदारी से मैं यह नहीं चाहता कि यह संख्या और बढ़े, क्योंकि इसका मतलब यही होगा कि शहर में भूखे लोग बढ़ रहे हैं। सोशल मीडिया का इस्तेमाल करके पिछले साल मैंने 'दो रोटी अभियान' चलाया था, जिसमें मैंने देश भर के लोगों से अपील की कि वे घर से दो रोटी ज्यादा लेकर निकलें और सिग्नल पर भीख मांगने वाले बच्चों को पैसे देने के बजाय रोटी दें। मेरी अपील को हजारों लोगों ने हाथों-हाथ लिया।
मैं कोई नकदी मदद नहीं लेता, जिससे कई लोग मुझे राशन दान देते हैं। जब दान में मिले राशन की अधिकता हो जाती है, तो मैं उसे दूसरे शहरों में चल रहे भंडारों में भेज देता हूं। इस तरह देश के अलग-अलग आठ जगहों पर लंगर का मेरा नेटवर्क तैयार हो चुका है। मैं मुल्क के उन सभी लोगों का शुक्रगुजार हूं, जिन्होंने मेरी ख्वाहिशों को अंजाम तक पहुंचाया है।