मैंने उसे बचाने में अपना सब कुछ झोंक दिया। खुशकिस्मती से एक हफ्ते के इलाज के बाद वह ठीक होने लगा। उस घटना के बाद मुझे कम से कम यह समझ आ गया कि किसी की भी जान सिर्फ जान होती है। कोई फर्क नहीं पड़ता कि उस बच्चे की पृष्ठभूमि क्या थी। जल्द ही मुझे वहां एक ऐसे अस्पताल में काम करने का अवसर प्राप्त हुआ, जो मुफ्त सेवाएं प्रदान करता था।
कुछ वक्त बाद मैं भारत लौट आई और अपने गृह राज्य गुजरात के कच्छ में प्रैक्टिस शुरू कर दी। यहां काम करने के दौरान हर दिन मेरा सामना कुछ विशेष बच्चों से होता था। लोग अपने बच्चे को ठीक कराने मेरे पास आते। मुझे जरूरत महसूस हुई और जल्द ही मैंने उन बच्चों के लिए धनवंतरी नाम से एक विशेष स्कूल खोल दिया। शुरू में स्कूल उनके लिए ही था, जिन्हें सुनने में दिक्कत थी। आगे चलकर स्कूल का दायरा उन विशेष बच्चों तक पहुंच गया, जो मानसिक रूप से अक्षम होते हैं।
इस स्कूल में मेरे अलावा विशेष शिक्षकों की पूरी टीम काम करती है। ये टीम केवल कक्षा के भीतर ही काम नहीं करती, बल्कि वहां से बाहर निकलकर समुदायों, गांवों और घरों तक पहुंचकर उन्हें कुछ न कुछ सिखा रही है। हम प्रत्येक बच्चे के अभिभावकों तक पहुंचते हैं, उन्हें बताते हैं कि वे कैसे अपने बच्चे को बेहतर तरीके से पाल सकते हैं। इन विशेष बच्चों की चुनौतियों के मद्देनजर उनकी जरूरतों का सही आकलन करके उनके घरवालों को जागरूक बनाया जाता है। इस स्कूल के सुचारु संचालन के लिए हर साल लाखों रुपयों का खर्च आता है। अच्छी बात यह है कि इसकी पूर्ति अनेक भले दानदाताओं से हो जाती है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।