अड़तालीस वर्ष पहले मेरा जन्म पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले में हुआ था। अपने कुल छह भाई-बहनों में मैं सबसे छोटी हूं। मैंने चलना भी नहीं सीखा था, जब मेरे पिता परिवार छोड़कर बांग्लादेश चले गए थे। मां ने परिवार चलाने के लिए सब्जी बेचना शुरू कर दिया। वह रोजाना चालीस किलोमीटर का सफर तय करके कोलकाता सब्जी बेचने जाती थीं। मां मुझे घुमाने के लिए अपने साथ शहर ले जाती थीं। दरअसल मुझे कोलकाता की सड़कों पर चलने वाली ट्राम और बसों को देखना पसंद था। मुझे याद है कि कई मर्तबा जब मां सब्जी बेच रही होती थीं, मैं वहीं फुटपाथ पर सो जाती थी।
फिर एक दिन मेरी जिंदगी में एक अहम मोड़ आया। वहां के एक स्थानीय समाजसेवी और चित्रकार बलदेव राज पनेसर हर रोज सब्जियां खरीदने आते थे। वह मेरी मां से ही सब्जी खरीदते थे। गरीब बच्चों को चॉकलेट, अंडे, पेंसिल, पत्र-पत्रिकाएं बांटते रहना उनकी पहचान थी। बंगाली में अंडे को डिंब कहते हैं, इसलिए बच्चे उन्हें प्यार से डिंबबाबू पुकारते थे। उस दिन डिंबबाबू ने मुझे भी चॉकलेट व अंडे देने की कोशिश की। लेकिन मां की सीख के मुताबिक, मैं किसी अनजान व्यक्ति से कुछ भी नहीं लेती थी।
मेरे अनुशासन से पनेसर बाबा प्रभावित हुए। किसी दूसरे दिन वह फिर आए और उन्होंने मेरी मां से मुझे स्कूल भेजने की बात कही। मेरी मां मान गई। हालांकि सात साल तक गांव में रहने के बाद शहर में पढ़ाई की शुरुआत करना मेरे लिए बहुत आसान नहीं था। फिर भी मैंने बाबा के रहमोकरम से थोड़ी-बहुत बांग्ला जरूर सीख ली। एक ओर बाबा मेरी जिंदगी बेहतर बनाने में जुटे थे, दूसरी ओर उन्हें बताए बगैर मां ने बारह साल की उम्र में मेरी शादी कर दी। मेरी शादी एक ऐसे शख्स से कर दी गई थी, जिसकी अपनी समस्याएं थीं।
शादी के कुछ वर्ष बाद मैं बाबा से मिलने गई। नजरें झुकाकर मैंने उनसे पूछा कि क्या मैं पैसे कमाने के लिए कोई काम कर सकती हूं? उन्होंने सलाह दी कि मैं ठोंगा (कागज के थैले) बनाकर बेचूं। दरअसल उन्होंने मुझे यह काम करने को इसलिए कहा था, क्योंकि वह जानते थे कि बचपन में मेरी चित्रकला अच्छी थी। उन्होंने मुझे ड्राइंग बुक और पेन दिया और स्केच बनाने को कहा। मैंने स्केच बनाकर बाबा को दिखाया, तो उन्होंने उन्हें अखबार में छपने के लिए भेज दिया। दोनों स्केच अखबार में छपे। फिर एक दिन बाबा मुझको एक कला प्रदर्शनी में ले गए। क्या दिन था वह! उस कला कुंभ में मैंने घंटों डुबकी लगाई। एक-एक कलाकृति को बेहद बारीकी से देखा।
मैंने इससे पहले कभी ऐसी प्रदर्शनी नहीं देखी थी। उस दिन बाबा की पारखी नजरों ने मेरे भीतर के कलाकार को मान्यता दे दी। बाबा से उपहार स्वरूप मिले पेंटिंग के सामान को जब मैंने अपने पति को दिखाया, तो वह मुझ पर हंसने लगे। लेकिन मैंने किसी की परवाह न करते हुए अपना काम जारी रखा।
कुछ समय में मैंने अपनी पहली पेंटिंग तैयार कर ली। जब मैंने अपनी पेंटिंग बाबा को दिखाई, तो वह उससे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपने दोस्तों को पेंटिंग दिखाई। उन्हीं की मदद से मैं और दिलचस्पी लेकर काम करने लगी और जल्द ही मैंने 1990 में अपना पहला कोलाज तैयार करके एक आर्ट गैलरी में प्रदर्शित किया। उस कोलाज से मुझे सत्तर हजार रुपये मिले, जो मेरे लिए बहुत बड़ी रकम थी। आज सेंटर ऑफ इंटरनेशनल मॉडर्न आर्ट गैलरी के प्रबंधन से मेरी कलाकृतियां विदेशों में भी नाम कमा रही हैं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।