मैं मूलतः बिहार से हूं, पर पिता की वन विभाग में नौकरी के कारण मेरा बचपन देश के पूर्वोत्तर राज्यों में बीता है। 2003 में एक वकील से मेरी शादी हो गई और मैं बिहार में अपने ससुराल में एक सामान्य गृहिणी की तरह रहने लगी। बिहार आकर मैंने वकालत की तालीम हासिल की और इसी क्षेत्र में करियर बनाने के बारे में सोचने लगी। मैं आसपास के लोगों से मिलती रहती थी। मैं जहां रहती थी, वहां की लड़कियों का निम्न शैक्षणिक स्तर देख कर मुझे हैरानी होती।
मुझे लगा कि मैं अपने आास-पड़ोस की लड़कियों को अंग्रेजी की कोचिंग दे सकती हूं। यही सोचकर मैंने घर पर ही कोचिंग शुरू कर दी। धीरे-धीरे मेरी कोचिंग की लोकप्रियता बढ़ने लगी और मुझे भी बच्चों को पढ़ाने में आनंद आने लगा। मैंने इसी काम के जरिए समाज को कुछ देने का निर्णय लिया। पुष्पा नाम की अपनी छात्रा को मैं कैसे भूल सकती हूं, जो एक बेहद गरीब परिवार से आती थी। मेरी मदद की बदौलत उसने बैंक की नौकरी हासिल की और अपने परिवार का सहारा बनी।
आगे चलकर मैंने घर से अलग एक पृथक कोंचिग सेंटर खोल दिया। शुरू में शुल्क लेकर पढ़ाने के काम को मैंने जरूरतमंद गरीब बच्चों के लिए निःशुल्क कर दिया। आगे चलकर मैंने अपने ही पढ़ाए छात्र-छाआओं के समूह बनाकर उन्हें झुग्गियों में रहने वाले गरीब बच्चों के परिवारवालों को समझाने के लिए भेजना शुरू किया। मेरे प्रयासों को सफलता मिली और देखते ही देखते मैंने सैकड़ों बच्चों को शिक्षा से जोड़ दिया।
चूंकि मेरे पास कानूनी जानकारी भी है, इसलिए मैं समाज के गरीब जरूरतमंदों की विधिक मदद भी करती रहती हूं। कुछ वक्त पहले मैं एक नाबालिग बलात्कार पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए समाज और पूरी व्यवस्था से सफलतापूर्वक लड़ चुकी हूं। मैंने कोई बड़ा काम नहीं किया है। मैं तो बस अपने छोटे-छोटे कदमों से समाज में बदलाव लाने की कोशिश करती रहती हूं।