इस प्रतियोगिता में किसी भी मिस्त्री को तय वक्त में किसी खास कन्सट्रक्शन को बनाकर दिखाना था। मतलब न सिर्फ काम की तेजी, बल्कि दिमाग की खूबी को भी इस प्रतियोगिता में एक साथ प्रदर्शित करना था। बेहतर काम करने वाले को पुरस्कृत किए जाने का प्रावधान था। मेरे लिए तो यह खुद को साबित करने का अवसर जैसा था। मैंने प्रतियोगिता में भाग लिया और दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में दूसरा स्थान हासिल किया।
अच्छी बात यह थी कि कंपनी स्तर की यह प्रतियोगिता राष्ट्रीय स्तर पर भी आयोजित होती थी। यहां भी मुझे दूसरा स्थान मिला। मुझे अपना कौशल दिखाने के मंच मिलते रहे। मुझे ज्ञात हुआ कि ऐसी ही एक प्रतियोगिता वैश्विक स्तर पर होती है। लेकिन उसमें भाग लेने के लिए मेरी तैयारी पर्याप्त नहीं थी। इसके लिए मैंने प्राइवेट रियल एस्टेट एसोसिएशन (क्रेडाई) द्वारा चलाए जा रहे 'कुशल' कार्यक्रम के अंतर्गत प्रशिक्षण लिया। ब्रिकलेयिंग कहे जाने वाले इस कौशल की खासियत यह है कि कोई भी ब्रिकलेयर अपने पुराने डिजाइन को दोहरा नहीं सकता। इसलिए मैंने लगातार दिमागी कसरत जारी रखी।
कुछ महीने पहले मैंने दुबई में आयोजित अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में हिस्सा लिया। वहां मेरे सामने 59 देशों के कुशल प्रतिभागी थे। मैंने पूरी मेहनत की, पर मुझे पांचवां स्थान मिला। मेरे लिए यह निराशाजनक तो था, लेकिन मैंने जो हासिल किया, वह भी कम नहीं था। मुझे समझ में आ गया है कि कोई भी काम बड़ा या छोटा नहीं होता। छोटे से छोटा काम भी यदि पूरे जतन से किया जाए, तो उसका परिणाम सुखद होता है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।