फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

'छोटे से छोटा काम भी यदि पूरे जतन से किया जाए, तो उसका परिणाम सुखद होता है'

Mon, 23 Jul 2018 03:40 PM IST
रोहिम मोमिन
विज्ञापन
रोहिम मोमिन
विज्ञापन

एक सड़क दुर्घटना में जब मेरे पिता की मौत हुई थी, उस वक्त मैं ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ रहा था। वह घर के इकलौते कमाने वाले शख्स थे। मैं पढ़ने में तेज था और भविष्य में शिक्षक बनने का ख्वाब देखता था। लेकिन परिवार के लिए मुझे स्कूल छोड़ना पड़ा। मैं काम की तलाश में था। किताबों से दूर हुए बहुत दिन नहीं हुए थे कि मेरे हाथों में कन्नी-बसूली आ गई। अजीब तो लगा, मगर परिवार की खातिर यह जरूरी था।

विज्ञापन


पश्चिम बंगाल के जिस मालदा जिले से मैं आता हूं, बहुतायत में वहां के मजदूर दिल्ली और इसके आसपास के शहरों में काम करने के सिलसिले में आते हैं। हमारे यहां कई ठेकेदार मजदूरों को लाने-जाने का काम करते हैं। ऐसे ही एक ठेकेदार से मिलने के बाद मैंने भी दिल्ली आने की योजना बनाई, क्योंकि मालदा में इतनी कमाई नहीं हो पा रही थी, जिससे कि मेरा परिवार सम्मानजनक जिंदगी जी सके। ऊपर से मुझ पर तीन छोटी बहनों का भविष्य बेहतर करने का का भी दबाव था। यही सब सोचकर 2014 में मैं दिल्ली आ गया। दिल्ली आने के बाद मैं यहां किसी सामान्य श्रमिक की भांति काम करने लगा।

मैं उस वक्त महज सत्तरह साल का था। मेरे लिए खुद को किसी एक काम में सीमित रखना आसान नहीं था। मेरे दिमाग में शारीरिक श्रम के अलावा दूसरे तरह के कौशल सीखने के खयाल चलते रहते। लेकिन मानसिक विचारों को धरातल पर उतारने के लिए वक्त इजाजत नहीं देता था। आखिरकार मैंने भवन निर्माण के काम में ही अपनी उपयोगिता बढ़ाने का फैसला किया। मैंने अपने ईंट-गारे के काम को ही व्यवस्थित प्रशिक्षण के माध्यम से और विकसित किया। मुझे पता था कि उन मजदूरों को ज्यादा दिहाड़ी मिलती है, जो थोड़ा-बहुत मिस्त्रीगीरी यानी चुनाई आदि का काम कर लेते हैं। लगन के दम पर चंद महीनों में ही मैंने यह काम सीख लिया। इस बीच मैंने एक खास प्रतियोगिता के बारे में सुना।

विज्ञापन
विज्ञापन

इस प्रतियोगिता में किसी भी मिस्त्री को तय वक्त में किसी खास कन्सट्रक्शन को बनाकर दिखाना था। मतलब न सिर्फ काम की तेजी, बल्कि दिमाग की खूबी को भी इस प्रतियोगिता में एक साथ प्रदर्शित करना था। बेहतर काम करने वाले को पुरस्कृत किए जाने का प्रावधान था। मेरे लिए तो यह खुद को साबित करने का अवसर जैसा था। मैंने प्रतियोगिता में भाग लिया और दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में दूसरा स्थान हासिल किया।

अच्छी बात यह थी कि कंपनी स्तर की यह प्रतियोगिता राष्ट्रीय स्तर पर भी आयोजित होती थी। यहां भी मुझे दूसरा स्थान मिला। मुझे अपना कौशल दिखाने के मंच मिलते रहे। मुझे ज्ञात हुआ कि ऐसी ही एक प्रतियोगिता वैश्विक स्तर पर होती है। लेकिन उसमें भाग लेने के लिए मेरी तैयारी पर्याप्त नहीं थी। इसके लिए मैंने प्राइवेट रियल एस्टेट एसोसिएशन (क्रेडाई) द्वारा चलाए जा रहे 'कुशल' कार्यक्रम के अंतर्गत प्रशिक्षण लिया। ब्रिकलेयिंग कहे जाने वाले इस कौशल की खासियत यह है कि कोई भी ब्रिकलेयर अपने पुराने डिजाइन को दोहरा नहीं सकता। इसलिए मैंने लगातार दिमागी कसरत जारी रखी।

कुछ महीने पहले मैंने दुबई में आयोजित अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में हिस्सा लिया। वहां मेरे सामने 59 देशों के कुशल प्रतिभागी थे। मैंने पूरी मेहनत की, पर मुझे पांचवां स्थान मिला। मेरे लिए यह निराशाजनक तो था, लेकिन मैंने जो हासिल किया, वह भी कम नहीं था। मुझे समझ में आ गया है कि कोई भी काम बड़ा या छोटा नहीं होता। छोटे से छोटा काम भी यदि पूरे जतन से किया जाए, तो उसका परिणाम सुखद होता है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें