संयोग से मेरे दोस्त का बेटा विपुल प्रकाश विभिन्न कंपनियों में निवेश करने वाला सफल उद्यमी निकला। विपुल को मेरी बातों ने प्रभावित किया और उसने एक तकनीशियन कृतार्थ मल्होत्रा की मदद से मुझे दफ्तर सहित वे सारी चीजें मुहैया कराईं, जिनकी मुझे अपने विचार जमीन पर उतारने के लिए जरूरत थी।
इसके बाद तो लगभग बंद हो चुकी मेरी जीवन रूपी गाड़ी फिर से चालू हो गई। कृतार्थ और मैंने मिलकर जुलाई, 2017 से अपने सामाजिक उद्यम 'हम' से ऐसे लोगों को जोड़ना शुरू किया, जिन्हें हमारी जरूरत हो सकती थी। हमें खास सफलता तब मिली, जब दिल्ली के एक रिटायर्ड बैंककर्मी मिस्टर गुलिया जी हमसे जुड़े। हमें उनके करियर का अंदाजा था, इसलिए हमने एक नामी प्राइवेट वित्तीय कंपनी से संपर्क करके गुलिया जी के अनुभवों का नियोजन करने का प्रस्ताव रखा।
हमारी बात मान ली गई और गुलिया जी के लिए कंपनी में एक खास पद का सृजन किया गया। कंपनी को इससे फायदा हुआ और आगे चलकर गुलिया जी ने हम की मदद से अपने जैसे दिल्ली के तमाम पूर्व बैंकरों का एक समूह बना दिया। एक नई दुनिया बस चुकी थी और इसी नई दुनिया ने हमें प्रेरित किया और लोगों को अपने मंच से जोड़ने को।
आज सोशल मीडिया के माध्यम से हमसे दोनों तरह के रिटायर्ड वृद्ध जुड़ रहें है, वे भी जिन्हें कुछ काम के बदले पैसों की जरूरत है और वे भी, जिन्हें पैसे नहीं, बस नीरस अकेलेपन से मुक्ति चाहिए। ऐसे लोगों के लिए हम कई प्रकार के स्वयंसेवी कार्यक्रम चलाते हैं, जिसमें चिकित्सा, पर्यटन और अन्य सामाजिक गतिविधियां शामिल हैं। साल भर से भी कम सफर में हमने विभिन्न व्हाट्सऐप समूहों में अब तक करीब दो हजार लोगों को जोड़ लिया है। इनमें से करीब दो सौ लोगों को काम भी मिल चुका है। हम दिल्ली के दायरे से निकलकर देश के बारह शहरों तक पहुंच चुके हैं और बहुत जल्द यह आंकड़ा बीस का हो जाएगा।