इस बीच, मुझे एक धार्मिक संगठन द्वारा बच्चों के लिए संस्कारशालाएं आयोजित करने के बारे में पता चला। मुझे यह काम जंच गया और मैं भी उनके साथ हो ली। लेकिन कुछ हो दिनों में मुझे लगा कि बच्चों को संस्कारों के साथ बहुउद्देश्यीय शिक्षा की आवश्यकता है। इसके बाद एक बस्ती से मैंने कुछ बच्चों को इकठ्ठा कर अलग से पढ़ाना शुरू कर दिया। शुरू में वे बच्चे मुझसे बहुत प्रभावित नहीं हुए, पर जल्द ही मैंने रफ्तार पकड़ ली।
यह सब मैं बिना घर वालों को बताए किए जा रही थी। एक दिन स्थानीय अखबार में मेरे काम के बारे में खबर छपी, जिसे गांव में मेरे पिता ने पढ़ा, तो वे चकित रह गए। उनके चकित होने की वजह भी थी, क्योंकि तब तक मुझे गरीब बच्चों को पढ़ाते हुए एक साल हो चुके थे। पिता के मन में मेरे भविष्य को लेकर कुछ आशंकाएं पैदा हुईं, लेकिन जल्द ही मैंने उन्हें विश्वास में ले लिया। दरअसल मैं इस काम में होने वाले खर्च के लिए अपनी पॉकेट मनी इस्तेमाल करती थी।
झुग्गी के बच्चों को पढ़ाने का मेरा काम दिनोंदिन बढ़ता गया, और मेरे प्रयासों से उन बच्चों के अभिभावकों ने उन्हें स्कूल भेजना भी शुरू कर दिया। इस सफलता से मुझे जो संतुष्टि मिली, उसे मैं बयान नहीं कर सकती। मैंने उन लोगों को अपने काम से जोड़ा, जो अपने जन्मदिन या अन्य मौकों को गरीबों के बीच जाकर मनाना पसंद करते हैं। ऐसे लोग इन बच्चों के बीच अपना जन्मदिन मनाते हैं।
आज मेरे साथ कई स्वयंसेवक जुड़ गए हैं। इनमें कई उच्च शिक्षित लोग भी शामिल हैं। फिलहाल हम करीब 200 बच्चों को स्कूल तक पहुंचाने में कामयाब हुए हैं। अगले दो महीने में मेरी एमएससी की पढ़ाई पूरी हो रही है। मेरी योजना है कि मैं प्रशासनिक सेवा से जुड़कर समाज के लिए और बेहतर तरीके से काम करूं।