लिहाजा हमने उसे भी मदद दी। बुजुर्ग महिलाएं और दिव्यांग, जो अनाज खुद नहीं ले जा सकते, पैकेट उनके घर पर भेज देने की व्यवस्था है। मेरे इस काम में सहयोगी व्यापारी बहुत मदद करते हैं। मैं जिनसे माल खरीदता हूं, और जिन व्यापारियों को बेचता हूं, वे नियमित रूप से हमारी मदद करते हैं। इस काम में मुझे पैसों की कमी आज तक महसूस नहीं हुई। दरअसल कमी पैसे की नहीं है। इसके लिए जुनून होना चाहिए। व्यापारी बंधु खुले हाथों से मेरे इस काम में सहयोग करते हैं।
कपिल सहगल जी भी अनाज के पैकेट भिजवाते हैं। इसके अलावा जितने पैसे की आवश्यकता होती है, वह मैं खुद खर्च करता हूं। छिहत्तर की उम्र में भी परोपकार के इस काम में मुझे ऊर्जा मिलती है। मैंने यह अभियान कोई लाभ या प्रचार पाने के लिए शुरू नहीं किया है, बल्कि यह काम मैं नि:स्वार्थ भाव से करता हूं। जरूरतमंदों की मदद करने से मेरे मन को संतुष्टि मिलती है। संतोष की बात यह भी है कि इस नेक काम में मेरे परिवार के लोग भी मेरे साथ हैं।
इस काम में समय के अलावा मैं पैसा भी खर्च करता हूं, लेकिन परिवार के लोगों ने कभी इस पर आपत्ति नहीं की। बल्कि वे मेरी इस मुहिम से खुश हैं। गरीबों को अनाज बांटने का यह काम बंद नहीं होगा, बल्कि मेरे बाद मेरे बेटा इसे जारी रखने की बात कह चुका है।