बाकियों का तो नहीं, पर यह खर्च बचाने के लिए मैंने सोचा कि बस का ड्राइवर मैं ही बन जाऊं, तो क्या बुरा है! पैसे भी बचेंगे और बच्चों की सुरक्षा का जिम्मा भी अपने हाथ में रहेगा। और इस तरह मैं शिक्षक के साथ स्कूल बस ड्राइवर की दोहरी भूमिका में आ गया। कमाल देखिए, मात्र बस की सुविधा होते ही हमारे स्कूल में बच्चों की संख्या साठ से बढ़कर नब्बे तक पहुंच गई।
अतिरिक्त काम की वजह से मेरी दिनचर्या थोड़ी-सी बदल गई। मुझे सुबह घर से करीब डेढ़ घंटे पहले निकलना पड़ता है। मेरे स्कूल में हर दिन बच्चों की संख्या नब्बे ही रहे इसके लिए दिनभर में मुझे कुल साठ किलोमीटर बस चलानी पड़ती है, क्योंकि ज्यादातर बच्चे देहाती इलाकों में रहते हैं। मैं बस के ईंधन का खर्च खुद वहन करता हूं, हालांकि मुझे इस बात की फिक्र नहीं है।
हां, मेरी एक चिंता जरूर है और वह है कि यदि मेरा स्थानांतरण किसी दूसरे विद्यालय में कर दिया गया, तो क्या होगा? मैं कोशिश में हूं कि इसी वर्ष आयोजित होने वाले हीरक जयंती कार्यक्रम में पूर्व छात्रों की बैठक में कोई समाधान जरूर निकाला जाए कि मेरे न रहने पर भी बस के चक्के न थमें। किसी जरूरी काम से यदि मैं एकाध दिन का अवकाश भी लेता हूं, तो उससे पहले ही यह सुनिश्चित करके छुट्टी पर जाता हूं कि स्कूल बस सेवा प्रभावित न हो।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।