इस काम के लिए मैंने रेलवे स्टेशन को चुना ही इसलिए है, क्योंकि मुंबई जैसे शहर में कम से कम समय में अधिकतम लोगों तक पहुंचने का इससे बेहतर जरिया नहीं हो सकता। हाल ही में मैंने एक मराठी अखबार में ध्वनि प्रदूषण से संबंधित एक लेख पढ़ा। उसे पढ़ने के बाद मैंने इस तरह के प्रदूषण के विरुद्ध भी संदेश प्रचारित करना शुरू कर दिया।
फिर चाहे वह किसी धार्मिक उत्सव का गाना-बजाना हो या फिर शादियों में होने वाला धूम-धड़ाका। किसी न किसी बहाने हम अक्सर ध्वनि प्रदूषण से दो-चार होते रहते हैं। मैं लोगों को यही बताता हूं कि हम यदि ऐसे ही शोरगुल मचाते रहेंगे, तो हमें इसके कितने गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। मेरे जैसे कितने ही रिटायर्ड लोग हैं, जो समाज के लिए अब भी कुछ करना चाहते हैं। सरकार को चाहिए कि ऐसे लोगों को ध्वनि स्तर मापने वाली मशीनें दे दें। सरकार के लिए ऐसे लोग काफी काम आ सकते हैं।
हम सभी को सिर्फ अपनी फिक्र नहीं करनी चाहिए। लोगों को सोचना चाहिए कि वे लोग जैसे अपने घर में कहीं भी कूड़ा नहीं फेंकते या किसी भी जगह नहीं थूकते, उनकी ऐसी ही आदतें घर से बाहर भी होनी चाहिए। यदि हम दूसरों की चिंता नहीं करेंगे, तो दूसरे हमारी चिंता नहीं करेंगे। हमें एक-दूसरे का मददगार बनकर बेहतर समाज बनाना होगा।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।