उग्रवादी साये के चलते मुख्यधारा के समाज में मेरे लिए अपनी जगह ढूंढ पाना मुश्किल हो रहा था। उग्रवाद छोड़ने के बावजूद समाज में लोग मुझसे डरते थे। उनका डर जायज था, कई मौकों पर मेरे जैसे उग्रवादियों की वजह से निर्दोष व्यक्तियों को भी पुलिस की प्रताड़ना झेलनी पड़ी थी। सामाजिक अस्वीकार्यता के बावजूद मैंने दोबारा उल्फा से जुड़ने का विचार नहीं किया, क्योंकि मैंने बहुत ईमानदारी से समर्पण किया था। मेरे दिमाग पर दबाव बढ़ता जा रहा था, जिससे राहत ढूंढने के प्रयास में मुझे शराब की लत लग गई।
वर्षों तक ऐसे ही जिल्लत भरा सिलसिला चलता रहा। एक दिन मेरे ही जैसे एक पूर्व उग्रवादी ने मुझे सरकार से अपना हक मांगने की सलाह दी। मैंने आवेदन किया, तो एक लंबे वक्त के बाद मुझे सरकारी पत्र मिला, जिसमें मुझसे मेरे जैसे लोगों की सूची मांगी गई थी। मैंने सब कुछ वैसा ही किया, जैसा मुझसे कहा गया। फलस्वरूप मुझे 220 पूर्व उल्फा सदस्यों के साथ प्रशिक्षण के लिए आर्ट ऑफ लिविंग आश्रम भेजा गया। मुझे उस वक्त भी सरकार की मंशा पर शक हुआ कि आश्रम में भेजकर हमारा पुनर्वास कैसे होगा? पर मेरी आशंका गलत निकली। आश्रम के वातावरण ने मुझ पर गहरा असर डाला।
ध्यान आदि की मदद से मैंने न सिर्फ शराब पर काबू पाया, बल्कि मानसिक रूप से इतना मजबूत हो गया कि वापस गांव लौटकर मैंने दूसरों के लिए शिविर का आयोजन किया। लोग मेरा बदला स्वरूप देखकर चकित थे। मगर आज मुझे देखकर कोई चकित नहीं होता है, क्योंकि विभिन्न सामाजिक कार्यक्रमों की मदद से मैं पूरे गांव का चहेता बन गया हूं। उल्फा से जुड़ने के वक्त लोग डर की वजह से मेरा सम्मान करते थे, लेकिन अब मेरे प्रति सम्मान में उनका प्यार देखा जा सकता है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।